Jaya Ekadashi 2026 – तिथि, कथा, महत्व, पूजा विधि व उपवास नियम

Jaya Ekadashi Puja Vidhi

जया एकादशी, जिसे भैमी एकादशी भी कहा जाता है, माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है। इस एकादशी को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाने वाली, भय दूर करने वाली और यश की प्राप्ति करवाने वाली एकादशी कहा गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो भी Jaya Ekadashi Vrat श्रद्धा और नियमों के साथ करता है, उसके जीवन में भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत से मन के दोष, भय, पितृदोष, और पिछले जन्मों के कर्मों से मिलने वाली बाधाएँ समाप्त होती हैं। यह व्रत गृहस्थों, विद्यार्थियों और आध्यात्मिक मार्ग के साधकों के लिए अत्यंत फलदायी है। जया एकादशी का पालन न केवल पापों का नाश करता है बल्कि मोक्ष की दिशा में भी मार्ग प्रशस्त करता है।

Jaya Ekadashi 2026 – तिथि एवं समय

विवरणसमय / तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ29 जनवरी 2026, दोपहर 12:28 बजे
एकादशी तिथि समाप्त30 जनवरी 2026, दोपहर 02:55 बजे
पारण का समय31 जनवरी 2026, सुबह 07:11 बजे से 09:26 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त31 जनवरी 2026, रात 10:17 बजे

Jaya Ekadashi Vrat Katha – जया एकादशी की सम्पूर्ण कथा

प्राचीन समय में देवराज इंद्र के नंदन वन में अनेक दिव्य अप्सराएँ और गंधर्व निवास करते थे। उन अप्सराओं में पुष्पावती नाम की एक अत्यंत सुंदर और कुशल नर्तकी थी। देवताओं की सभा में जब-जब महोत्सव या उत्सव आयोजित होता, प्रेरक संगीत और नृत्य से सभा को आनंदित करना उसी का कार्य था। एक दिन देवराज इंद्र की दिव्य सभा सुसज्जित थी, जहाँ गंधर्व मलयवान गायन कर रहे थे और पुष्पावती नृत्य प्रस्तुत कर रही थी।

उस समय उनकी दृष्टि एक-दूसरे से मिली और प्रेमवश दोनों का मन विचलित हो गया। उनके चेहरे पर लज्जा और अनियंत्रित हँसी उभर आई, जिससे सभा का माहौल अस्थिर हो गया। इंद्र को यह व्यवहार अहंकार और अपमानजनक प्रतीत हुआ। क्रोधित इंद्र ने उन्हें श्राप दिया:

“तुम दोनों अपने दिव्य रूप खोकर पृथ्वी लोक पर राक्षस रूप में जन्म लोगे।”

इंद्र के इस कठोर श्राप से दोनों अत्यंत दुखी हुए। थोड़े ही समय बाद मलयवान और पुष्पावती अपने दिव्य स्वरूप से वंचित होकर मृत्यु लोक में गिर पड़े और भयंकर राक्षस रूप में प्रकट हुए – अत्यंत कुरूप, निर्बल और भयंकर पीड़ाओं से घिरे हुए। उनके मन में पाप, भय और अंधकार छाया रहता था। न उन्हें भोजन का सुख था, न शांति का।

समय बीतने पर एक दिन माघ मास की Jaya Ekadashi तिथि आई। उसी दिन हिमालय के नीचे स्थित ऋषियों का आश्रम जगमगा रहा था। वहाँ यज्ञ, कीर्तन, तप और जप चल रहा था। पुष्पावती, जो राक्षसी रूप में पीड़ित थी, अत्यधिक भूख-प्यास से तड़पती हुई उस आश्रम के निकट पहुँची और अत्यंत दुर्बल होने के कारण एक वृक्ष के नीचे बैठकर रात बिताने लगी।

वह अनजाने में Jaya Ekadashi Vrat का पालन कर बैठी:
न उसने उस दिन भोजन किया, न पाप कर्म किए, न क्रोध, न हिंसा, न दोष।

रातभर आश्रम में मंत्रोच्चार और भजन की ध्वनि सुनकर उसका मन धीरे-धीरे शांत होने लगा। अगले दिन द्वादशी के पारण समय में आश्रम के ऋषियों ने यज्ञ किया और प्रसादस्वरूप जल उसे दिया। जैसे ही उसने वह जल ग्रहण किया, उसी क्षण उसके भीतर दिव्यता जागी और उसका राक्षसी रूप समाप्त हो गया। वह पुनः अपने वास्तविक अप्सरा स्वरूप—उज्ज्वल, सुंदर और दिव्य में लौट आई।

उसी समय आकाशवाणी हुई:
हे पुष्पावती! तुम्हें यह मुक्ति Jaya Ekadashi Vrat के पुण्य से प्राप्त हुई है। इस व्रत का पालन करने से सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और भय, बंधन तथा श्राप से मुक्ति मिलती है।

जब मलयवान को यह समाचार मिला, तो वह भी उसी पुण्य के प्रभाव से अपने राक्षसी स्वरूप से मुक्त होकर गंधर्व रूप में प्रकट हो गया। दोनों पुनः इंद्रलोक लौट आए और इंद्र ने भी उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया।

यही कारण है कि Jaya Ekadashi का व्रत पापों के नाश, भय से मुक्ति, दोषों के हटने और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना गया है। यह व्रत जीवन के अंधकार को दूर कर मनुष्य को प्रकाश, शांति, सौभाग्य और दिव्यता प्रदान करता है।

Jaya Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में भगवान विष्णु, लक्ष्मी माता और तुलसी का पूजन करें। पूजा में पंचामृत, गंगाजल, चंदन, तुलसी दल, रोली, अक्षत, दीप, धूप और नैवेद्य शामिल करें। Jaya Ekadashi Vrat में दिनभर सात्त्विकता और शुद्ध विचार अत्यंत आवश्यक हैं। दिनभर व्रत रखें और फलाहार या जल का सेवन कर सकते हैं। शाम के समय दीपदान और विष्णु सहस्रनाम का पाठ अवश्य करें। रात को जागरण या भजन का विशेष महत्व बताया गया है। अगले दिन द्वादशी के पारण समय में भगवान विष्णु की आरती कर व्रत खोलें।

Jaya Ekadashi Vrat Rules – व्रत के नियम

इस व्रत में सत्य, अहिंसा, संयम, दया और सात्त्विकता का पालन करना चाहिए। व्रत के दौरान अनाज, चावल, दाल, मांसाहार, मदिरा, प्याज-लहसुन वर्जित हैं। मन से पवित्रता बनाए रखें और किसी जीव को कष्ट न पहुँचाएँ। पूरे दिन भजन, नामस्मरण, दान और सेवा के कार्य करें। क्रोध, लोभ, अपशब्द, झूठ और नकारात्मक व्यवहार से दूर रहें। रात में जागरण या ध्यान करना विशेष फल देता है। अगले दिन पारण के समय भगवान विष्णु का स्मरण करके व्रत खोलें।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
विष्णु भगवान की पूजा, आरती, भजनतामसिक भोजन, प्याज-लहसुन
फलाहार, सात्त्विक भोजनक्रोध, विवाद, नकारात्मकता
जरूरतमंदों को दान देंअनाज, चावल, दाल का सेवन
विष्णु सहस्रनाम व पाठझूठ, अपशब्द, कटु व्यवहार
रात को भजन/जागरण करेंदेर रात नकारात्मक गतिविधियाँ

FAQs - Jaya Ekadashi 2026

Q1. Jaya Ekadashi 2026 का पालन करने से क्या फल मिलता है?
Jaya Ekadashi 2026 व्रत का पालन करने से पापों का नाश होता है और जीवन में भय, बाधाएँ व नकारात्मकता समाप्त होती है। यह व्रत व्यक्ति को यश, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। पुराणों में इसे मोक्ष प्रदायक व्रत कहा गया है।
Jaya Ekadashi Vrat Katha में वर्णित है कि राक्षसी ने अनजाने में उपवास किया और अगले दिन पारण किया, जिसके प्रभाव से उसका श्राप समाप्त हो गया। इसी कारण यह व्रत जन्म-जन्मांतर के पापों और दोषों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।
हाँ, जो भक्त निर्जल नहीं कर सकते, वे फलाहार, दूध, मेवा या सात्त्विक पदार्थ ग्रहण कर सकते हैं। Jaya Ekadashi 2026 में अनाज पूरी तरह वर्जित है। शुद्ध आचरण व दया भाव बनाए रखना व्रत का मुख्य नियम है।
हाँ, Jaya Ekadashi 2026 व्रत सभी के लिए समान रूप से शुभ है। यह व्रत गृहस्थ लोगों के लिए भी अत्यंत लाभकारी है क्योंकि यह घर में शांति, सौभाग्य और समृद्धि बढ़ाता है।
Jaya Ekadashi Vrat का पारण द्वादशी के शुभ समय में किया जाता है। पारण का समय शास्त्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि सही समय पर व्रत खोलने से ही पूर्ण पुण्य और फल प्राप्त होता है।

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