Papmochani Ekadashi 2026 – तिथि, कथा, महत्व, पूजा विधि और उपवास नियम

पापमोचनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अत्यंत महान, पुण्यदायी और पापों का नाश करने वाली एकादशी मानी जाती है। इस व्रत को पापमोचनी इसलिए कहा गया क्योंकि यह जन्म-जन्मांतर से संचित पापों, दोषों, नकारात्मक ऊर्जा और बुरे कर्मों को नष्ट करने की शक्ति रखता है। Papmochani Ekadashi आत्मा को शुद्ध करने वाला, जीवन में संतुलन और प्रकाश लाने वाला तथा मानसिक शांति प्रदान करने वाला श्रेष्ठ व्रत है।

शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति अनेक जन्मों के कर्मबंधनों से मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है। पापमोचनी एकादशी मन को पवित्र, विचारों को स्थिर और हृदय को शांत बनाती है। यह व्रत दुख, भय, रोग, बाधाएँ और कर्मिक कष्टों को दूर करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह एकादशी मनुष्य की चेतना को उच्च बनाती है और ईश्वर से संबंध को गहरा करती है।

इसीलिए यह एकादशी उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है जो मानसिक अशांति, नकारात्मकता, पुराने दोष, पापबोध या जीवन के उतार-चढ़ाव से परेशान हैं। इस दिन भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा सभी की संयुक्त आराधना का महत्व बताया गया है, क्योंकि पापों से मुक्ति में तीनों देवों का आशीर्वाद समान रूप से प्रभावी माना गया है।

Papmochani Ekadashi – तिथि एवं समय

विवरणसमय / तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ14 मार्च 2026, सुबह 06:00 बजे
एकादशी तिथि समाप्त15 मार्च 2026, सुबह 03:10 बजे
पारण का समय15 मार्च 2026, सुबह 06:16 बजे से 08:27 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त15 मार्च 2026, रात 11:45 बजे

Papmochani Ekadashi Vrat Katha – पापमोचनी एकादशी की सम्पूर्ण कथा

पुराणों में वर्णित है कि प्राचीन समय में चैत्ररथ वन नामक एक अत्यंत सुंदर, दिव्य और आनंदमय तपोवन था। यह स्थान देवताओं, गंधर्वों और सिद्ध पुरुषों के लिए साधना का प्रिय स्थल था। इस पवित्र वन में ऋषि मेदिनी मुनि तपस्या में लीन रहते थे। उनका तप इतना प्रखर था कि उनके तेज से पूरा वन आलोकित होता था।

इंद्रलोक में यह चर्चा फैलने लगी कि मेदिनी मुनि की तपस्या यदि इसी प्रकार बढ़ती रही, तो वे देवताओं का स्थान भी प्राप्त कर सकते हैं। इंद्र को यह सुनकर चिंता हुई और उन्होंने कामदेव को भेजा कि किसी भी प्रकार मेदिनी मुनि का तप भंग कर दे। कामदेव अपनी शक्तियों के साथ मनोदावती नामक सुंदर अप्सरा को लेकर चैत्ररथ वन पहुँच गया।

मनोदावती की सुंदरता और रूप देखने मात्र से वन में आकर्षण का वातावरण बन गया। उसने मधुर नृत्य और संगीत से वातावरण को मोहक बना दिया। धीरे-धीरे मेदिनी मुनि का ध्यान विचलित हो गया। उनके मन में अप्सरा के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ और वे उस मोहजाल में फँस गए। लंबे समय तक वे अप्सरा के साथ रहने लगे और अपनी तपस्या से दूर हो गए।

कुछ समय बाद जब मुनि के मन का भ्रम दूर हुआ और उन्होंने अपनी गलती को पहचाना, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गए। क्रोध में उन्होंने मनोदावती को शाप दे दिया:

हे अप्सरा! तूने मेरे तप को भंग किया है, इसलिए तू राक्षसी बनकर पृथ्वी लोक में भटकती रहेगी!

मनोदावती रोने लगी और बोली:
हे मुनि! मैंने केवल कामदेव के आदेश पर यह किया था। कृपया मुझे क्षमा करें।

मुनि का हृदय पिघल गया, परंतु उन्होंने कहा:
मैं शाप वापस नहीं ले सकता, लेकिन मार्ग बता सकता हूँ। चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को Papmochani Ekadashi Vrat करना। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सभी पाप मिट जाएंगे और तुम पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करोगी।

मुनि ने भी अपने पापबोध और मोहजाल से मुक्ति पाने के लिए उसी एकादशी का व्रत करने का निर्णय लिया।

निर्धारित दिन आने पर अप्सरा ने पृथ्वी पर राक्षसी रूप में रहते हुए पापमोचनी एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा और नियमों से किया। उसने पूरे दिन उपवास रखा, भजन-कीर्तन सुना, पवित्र मन से भगवान विष्णु का स्मरण किया और रात उपवास में बिताई। द्वादशी के पारण के समय जैसे ही उसने जल ग्रहण किया, उसके भीतर दिव्य प्रकाश फैल गया और उसका राक्षसी रूप नष्ट हो गया। वह पुनः अपने वास्तविक अप्सरा रूप में प्रकट हुई।

उसी क्षण आकाशवाणी हुई:
हे मनोदावती! Papmochani Ekadashi Vrat के प्रभाव से तुम्हें पापों से मुक्ति मिली है। यह व्रत जीवन के सभी बुरे कर्मों, दोषों और बंधनों को समाप्त कर देता है।

दूसरी ओर मेदिनी मुनि ने भी इस व्रत के माध्यम से अपने पापों का नाश किया और पुनः तपस्या में स्थिर होकर महान सिद्धि प्राप्त की।

इसी कारण इस एकादशी को पापमोचनी कहा गया, क्योंकि यह मनुष्य को न केवल पापों से मुक्त करती है, बल्कि उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक बल प्रदान करती है।

Papmochani Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

पापमोचनी एकादशी की पूजा प्रातः स्नान और शुद्ध वस्त्र धारण करने से आरंभ होती है। घर में या मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति को स्थापित करके दीपक, धूप, तुलसी दल, चंदन, गंगाजल और पुष्प अर्पित करें। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवों की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि यह संयोजन साधक के भीतर की नकारात्मकता और पापों को जड़ से समाप्त करता है।

पूजा के दौरान Papmochani Ekadashi के संकल्प के साथ विष्णु सहस्रनाम, विष्णु गायत्री मंत्र या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करना अत्यंत शुभ माना गया है। दिनभर फलाहार या निर्जल उपवास रखते हुए साधक को भक्ति, ध्यान, दया और सेवा में मन लगाना चाहिए। शाम को दीपदान, मंत्रजाप और भजन-कीर्तन करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।

पूरे दिन सात्त्विकता बनाए रखना और मन को किसी भी प्रकार की नकारात्मक बातों से बचाना व्रत का अभिन्न अंग है। रात को थोड़ी देर ध्यान, जप या आध्यात्मिक ग्रंथों का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। अगले दिन द्वादशी के पारण समय में स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करके व्रत खोलना चाहिए। पारण का सही समय पालन करना व्रत की सिद्धि के लिए अनिवार्य है।

Papmochani Ekadashi Vrat Rules – व्रत के नियम

पापमोचनी एकादशी व्रत में सात्त्विक जीवनशैली, मन की पवित्रता, व्यवहार में सरलता और विचारों में शांति का पालन सबसे महत्वपूर्ण है। इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन, मांसाहार और मद्यपान का पूरी तरह त्याग करना चाहिए। दिनभर संयम, अहिंसा, करुणा, सत्य और संतुलन का पालन अनिवार्य माना गया है।

साधक को किसी भी जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए, कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और किसी भी प्रकार के झगड़े, विवाद या अधर्म से दूरी रखनी चाहिए। मन को शांत और स्थिर रखने के लिए मंत्रजाप और ध्यान अत्यंत लाभकारी हैं। व्रत के दौरान दूसरों की सेवा, दान, सत्संग और करुणा का अभ्यास करने से व्रत का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

शाम के समय दीपदान और भजन करने से मानसिक शुद्धि प्राप्त होती है। रात में बुरे विचारों से दूरी रखते हुए आध्यात्मिक ग्रंथों का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। अगले दिन द्वादशी पारण के समय का पालन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि गलत समय पर व्रत खोलने से व्रत का फल अपूर्ण माना जाता है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
आंवले के वृक्ष की पूजा व परिक्रमातामसिक भोजन (प्याज-लहसुन)
गरीबों को फल, वस्त्र, भोजन दान देंअनाज, चावल, दाल का सेवन
विष्णु नामजप और भजन करेंक्रोध, विवाद, कटु व्यवहार
सात्त्विक भोजन व फलाहारझूठ, अपशब्द, नकारात्मकता
दीपदान, पाठ और ध्यान करेंरात्रि में तामसिक गतिविधियाँ

FAQs - Papmochani Ekadashi Vrat

Q1. Papmochani Ekadashi 2026 व्रत करने से कौन-सा विशेष फल प्राप्त होता है?
Papmochani Ekadashi 2026 व्रत जीवन के बड़े से बड़े पाप, दोष और नकारात्मक कर्मों को नष्ट करता है। यह व्रत व्यक्ति के मन से बोझ हटाकर उसे हल्का, शांत और आध्यात्मिक बनाता है। साधक के जीवन में नए अवसर, सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक स्पष्टता आती है।
Papmochani Ekadashi Vrat Katha मेदिनी मुनि और मनोदावती की कथा पर आधारित है, जहाँ मोह, भ्रम और काम के प्रभाव से उत्पन्न पाप का नाश इसी व्रत से हुआ। यह कथा सिखाती है कि मनुष्य चाहे कितनी भी भूल कर बैठे, पापमोचनी एकादशी उसे सुधारने और पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान करती है।
हाँ, इस व्रत में फल, दूध, मेवा, पानी, नारियल जल और सात्त्विक पदार्थों का सेवन किया जा सकता है। लेकिन अनाज, चावल, दाल, तामसिक भोजन और भारी भोजन वर्जित है। फलाहार मन और शरीर को हल्का रखता है, जिससे आध्यात्मिक अभ्यास आसान होता है।
जो लोग मानसिक तनाव, नकारात्मक विचार, भय, पापबोध, दोष, रोग या जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हों, उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए। यह व्रत मन, शरीर और आत्मा — तीनों स्तरों पर शुद्धि और संतुलन प्रदान करता है, इसलिए यह सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है।
द्वादशी में निर्धारित पारण समय में व्रत खोलना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही समय व्रत की ऊर्जा का पूर्ण फल दिलाता है। पारण से पहले स्नान, पूजा और भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। गलत समय पर व्रत खोलने से व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव कम हो जाता है।

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