कामदा एकादशी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली अत्यंत पुण्यदायी, श्रापमोचक और पापों का नाश करने वाली एकादशी मानी जाती है। इस व्रत के बारे में कहा जाता है कि यह मनुष्य को हर प्रकार के अभिशाप, कर्मिक दोष, नकारात्मक ऊर्जा और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त करने की शक्ति रखती है। Kamada Ekadashi Vrat 2026 विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है जो अपने जीवन में बाधाएँ, संघर्ष, मानसिक तनाव या आध्यात्मिक अवरोधों का सामना कर रहे हों।
पुराणों में वर्णित है कि इस एकादशी का पालन करने से मनुष्य के जीवन में सौभाग्य, धन, शांति, प्रतिष्ठा और अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त होता है। यह व्रत साधक के मन, बुद्धि और आत्मा को पवित्र कर उसे ईश्वर की निकट लाता है। कामदा एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के दया और क्षमा स्वरूप से है, जैसे वह भक्त के जीवन में प्रेम, करुणा और दिव्यता का संचार करते हैं। यह एकादशी दाम्पत्य जीवन में भी प्रेम, एकता और सौभाग्य की वृद्धि करती है।
| विवरण | समय / तिथि |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 28 मार्च 2026, रात 02:15 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 29 मार्च 2026, सुबह 12:10 बजे |
| पारण का समय | 30 मार्च 2026, सुबह 06:34 बजे से 08:52 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 30 मार्च 2026, शाम 06:40 बजे |
पुराणों में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार प्राचीन समय में रत्नपुर नाम का एक अत्यंत सुंदर नगर था, जहाँ गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ निवास करती थीं। यह नगर इतना भव्य था कि उसकी शोभा देवलोक के समान मानी जाती थी। वहाँ ललित नामक एक महान गंधर्व गायक था, जिसकी आवाज़ सुनकर देवता भी आनंदित हो जाते थे। उसकी पत्नी ललिता अत्यंत सुंदर, गुणवान और अपने पति से अत्यधिक प्रेम करने वाली थी। दोनों का जीवन अत्यंत सुखी और प्रेमपूर्ण था।
एक दिन रत्नपुर में राजा शिखि-ध्वज की सभा में विशाल नृत्य-संगीत महोत्सव आयोजित हुआ। पूरे नगर से कलाकार एकत्र हुए और सभी ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। ललित भी अपने संगीत से सभी को मंत्रमुग्ध कर रहा था। उसी समय उसकी पत्नी ललिता दूर खड़ी उसे प्रेमपूर्वक देख रही थी। उसकी दृष्टि बार-बार अपने पति की ओर थी।
उसी क्षण राजा के एक प्रहरी ने ललिता को देखा और राजा से शिकायत की कि गंधर्व ललित का ध्यान संगीत में नहीं है, वह अपनी पत्नी की ओर देखकर प्रस्तुति को हल्का कर रहा है। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गया। उसने सभा के नियम को भंग करना माना और तुरंत ललित को श्राप दे दिया
हे ललित! तुमने सभा का अनादर किया है। अब तुम क्रूर नरसिंह (अर्धसिंह) रूप में धरती पर गिरोगे!
राजा के श्राप के प्रभाव से ललित क्षणभर में भयानक नरसिंह रूप में परिवर्तित हो गया। उसका शरीर विशाल, स्वर अत्यंत भयावह और मन अस्थिर हो गया। उसके बदलते रूप को देखकर उसकी पत्नी ललिता अत्यंत व्याकुल हो गई। वह रो-रोकर अपने पति को पुकारने लगी, लेकिन श्राप के कारण ललित को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह जंगलों में भागने लगा और मनोदशा इतनी विचलित थी कि अपने अस्तित्व को समझ भी नहीं पा रहा था।
ललिता ने अपने पति को बचाने का निश्चय किया। वह उसे खोजते-खोजते जंगलों, पर्वतों और नदियों को पार कर गई। महीनों की यात्रा के बाद वह ऋषि श्रृंगि के आश्रम पहुँची और रोकर पूरी घटना सुनाई। उसकी भक्ति, निष्ठा और पवित्र प्रेम को देखकर ऋषि श्रृंगि का हृदय द्रवित हो गया।
उन्होंने कहा:
हे सती! तुम्हारे पति की मुक्ति संभव है। फाल्गुन और चैत्र के बीच आने वाली Kamada Ekadashi का व्रत करोगी तो उसका श्राप समाप्त हो जाएगा। यह एकादशी पापों का नाश करने और अभिशापित जीवों को दिव्यता लौटाने की अद्भुत शक्ति रखती है। Kamada Ekadashi आपके लिए वरदान सिद्ध होगी।
ललिता ने संकल्प लेकर Kamada Ekadashi Vrat पूरी निष्ठा, सात्त्विकता और नियमों के साथ किया। उसने दिनभर उपवास रखा, विष्णु नामजप किया, दान किया और पूरे मन से भगवान से अपने पति के उद्धार की प्रार्थना की। अगले दिन द्वादशी के पारण समय में जब उसने विधि-पूर्वक व्रत पूर्ण किया, तब अचानक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।
उसी क्षण ललित का विकराल नरसिंह रूप नष्ट होने लगा। उसकी गर्जना शांत हुई, शरीर का भारीपन मिट गया, और कुछ ही क्षणों में वह अपने वास्तविक दिव्य गंधर्व स्वरूप में पुनः प्रकट हुआ। ललिता की आंखों में आनंद के आँसू आ गए।
दिव्य आकाशवाणी हुई:
हे ललिता! Kamada Ekadashi Vrat के पुण्य से तुम्हारे पति अभिशाप से मुक्त हुए हैं। इस व्रत में ऐसी शक्ति है जो जन्म-जन्मांतर के पापों और श्रापों को क्षणभर में नष्ट कर देती है।
इसी कारण Kamada Ekadashi को पाप नाशक, श्रापमोचक, मोक्षदायिनी और दाम्पत्य जीवन में सौभाग्य देने वाली एकादशी कहा गया है। यह व्रत प्रेम, निष्ठा, भक्ति और दया का दिव्य प्रतीक है।
कामदा एकादशी की पूजा प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने से शुरू होती है। भगवान विष्णु, लक्ष्मी और तुलसी माता की पूजा करनी चाहिए। पूजन सामग्री में चंदन, अक्षत, धूप, दीपक, पुष्प, फल, पंचामृत और तुलसी दल अवश्य रखें।
Kamada Ekadashi में मन, वचन और कर्म तीनों की शुद्धता आवश्यक है। दिनभर व्रत रखते हुए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है। रात्रि में जागरण, भजन या ध्यान भी बहुत फलदायक होता है।
पूरे दिन क्रोध, विवाद, नकारात्मक विचार, और किसी भी प्रकार के पाप कर्म से दूर रहें। शाम को दीपदान करें और विष्णु भगवान की आरती उतारें।
अगले दिन द्वादशी पारण समय में स्नान, ध्यान और पूजा के बाद व्रत खोलें। पारण समय का शास्त्रीय पालन अत्यंत आवश्यक है।
कामदा एकादशी व्रत में सात्त्विकता और पवित्रता सर्वोच्च मानी जाती है। इस दिन अनाज, चावल, दाल, तामसिक भोजन, मांसाहार और मद्यपान पूरी तरह वर्जित है। साधक को संयम रखना चाहिए और विचारों में शुद्धि लानी चाहिए।
दिनभर सत्य, अहिंसा, करुणा, दया और शांत भाव बनाए रखना अनिवार्य है। किसी भी जीव को कष्ट न दें और व्यर्थ विवादों से दूर रहें। यह व्रत मनुष्य के भीतर देवत्व को जागृत करता है।
दान, सेवा, सत्संग और आध्यात्मिक साहित्य का पाठ व्रत को और प्रभावी बनाता है। रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान और नामजप करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ता है। द्वादशी पारण समय का पालन व्रत सिद्धि का मुख्य नियम है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| विष्णु पूजा, जप, ध्यान | तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन |
| फलाहार और सात्त्विक आचरण | अनाज, चावल, दाल का सेवन |
| दान और सेवा | क्रोध, कटु वचन, विवाद |
| दीपदान और भजन | झूठ, अपशब्द, नकारात्मकता |
| रात्रि में ध्यान या जागरण | देर रात गलत गतिविधियाँ |