Varuthini Ekadashi 2026 – तिथि, कथा, महत्व, पूजा विधि और उपवास नियम

Varuthini Ekadashi – Date, Story & Fasting Rules

वरूथिनी एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अत्यंत शुभ, मंगलकारी और पापों का नाश करने वाली एकादशी मानी जाती है। “वरूथिनी” का अर्थ होता है — सुरक्षा प्रदान करने वाली या ढाल की तरह रक्षा करने वाली। यह एकादशी साधक को आध्यात्मिक, मानसिक, भौतिक और कर्मिक स्तर पर सुरक्षा प्रदान करती है। Varuthini Ekadashi विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है जो अपने जीवन में कठिनाइयों, बाधाओं, मानसिक तनाव, अज्ञात भय या नकारात्मक ऊर्जा का अनुभव कर रहे हों।

पुराणों में कहा गया है कि इस एकादशी का पालन करने से मनुष्य के जीवन में सौभाग्य, पवित्रता, धन और शांति बढ़ती है। यह व्रत पापों, अभिशापों, कर्मिक दोषों, नकारात्मक कंपन और अनचाहे संकटों को मिटाकर जीवन को सुखमय बनाता है। यह एकादशी प्रायः दुष्कर्मों से मुक्ति, पतन से उन्नति, दरिद्रता से संपन्नता और अशुभ परिस्थितियों से सुरक्षा प्रदान करती है।

Varuthini Ekadashi 2026 – तिथि, मुहूर्त व पारण समय

विवरणसमय / तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ11 अप्रैल 2026, रात 09:40 बजे
एकादशी तिथि समाप्त12 अप्रैल 2026, रात 07:10 बजे
पारण का समय13 अप्रैल 2026, सुबह 06:30 बजे से 08:45 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त13 अप्रैल 2026, शाम 05:20 बजे

Varuthini Ekadashi Vrat Katha – वरूथिनी एकादशी की सम्पूर्ण कथा

पुराणों के अनुसार प्राचीन समय में भद्रावती नाम का एक दिव्य और समृद्ध नगर था। इस नगर के राजा मान्धाता थे, जो अपने पराक्रम, दया, धर्मप्रियता और सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनका राज्य न्यायपूर्ण था और उनकी प्रजा सुखी जीवन व्यतीत करती थी। लेकिन एक समय राजा मान्धाता अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए वन में तपस्या करने चले गए। वह एकांत में बैठकर कठोर तप कर रहे थे।

एक दिन अचानक जंगल में एक क्रूर भालू भटकता हुआ उस स्थान पर आ पहुँचा जहाँ राजा तप कर रहे थे। भालू ने बिना कारण राजा पर हमला कर दिया। उसके प्रहार से राजा का पैर बुरी तरह घायल हो गया। भालू जंगल में लौट गया, परंतु राजा अत्यंत कष्ट में भूमि पर गिर पड़े। तेज पीड़ा के बाद भी उन्होंने तपस्या नहीं छोड़ी। उनका शरीर अशक्त हो गया और वे अत्यंत दुर्बल हो गए।

राजा की यह स्थिति देखकर देवताओं को चिंता होने लगी। वे महर्षि वशिष्ठ के पास गए और राजा की दुर्दशा का कारण पूछा।

महर्षि वशिष्ठ ने कहा:
यह दुख राजा मान्धाता को किसी पूर्व जन्म के पाप के कारण प्राप्त हुआ है। इस पाप से मुक्ति केवल वरूथिनी एकादशी व्रत के पालन से ही संभव है।

फिर देवताओं ने राजा मान्धाता को यह जानकारी दी। राजा ने महर्षि वशिष्ठ के शब्द सुनकर वरूथिनी एकादशी का व्रत करने का निश्चय किया। उचित समय आने पर राजा ने अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और सात्त्विकता के साथ इस एकादशी का व्रत आरंभ किया। उन्होंने दिनभर उपवास रखा, भगवान विष्णु का स्मरण किया, भजन किए और पूजा की।

द्वादशी के पारण के समय उन्होंने विधि-विधान से व्रत का समापन किया। व्रत पूर्ण करते ही उनके शरीर से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। उस तेज के प्रभाव से उनका क्षतिग्रस्त पैर चमत्कारिक रूप से ठीक हो गया। उनका शरीर पूर्ण स्वस्थ हो गया और वर्षों से जमा हुआ पाप भी मिट गए।

उसी समय आकाश से दिव्य वाणी हुई:
हे मान्धाता! तुम्हारा दुख वरूथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से समाप्त हुआ है। यह व्रत मनुष्य को पापों, संकटों और अभिशापों से बचाकर सुरक्षा प्रदान करता है। जो भी इस व्रत का पालन करता है, वह जीवन में सौभाग्य, धन, आरोग्य और शांति प्राप्त करता है।

इस प्रकार राजा मान्धाता का जीवन पुनः सुखी हो गया। वे अपने राज्य लौटे और प्रजा ने उन्हें देखकर हर्ष मनाया। उसी दिन से यह एकादशी “वरूथिनी” कहलाने लगी — अर्थात सुरक्षा देने वाली, संकटों से बचाने वाली, और पतन से उन्नति की ओर ले जाने वाली

यह कथा हमें बताती है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत मनुष्य को अदृश्य संकटों, पिछले जन्मों के पापों, दुर्भाग्य और दुर्बलताओं से सुरक्षित रखने वाला दिव्य कवच है

Varuthini Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

वरूथिनी एकादशी की पूजा प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनने से प्रारंभ होती है। भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को गंगाजल से शुद्ध करें। चंदन, तुलसी, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, फल और पंचामृत से पूजा करें। इस व्रत में Varuthini Ekadashi 2026 के संकल्प के साथ उपवास रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ है। दिनभर सात्त्विकता बनाए रखें, भजन-कीर्तन करें, दान करें और मन को शांत रखें। शाम को दीपदान करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। रात में थोड़ा समय ध्यान या भगवान विष्णु के नामजप में बिताना चाहिए।

अगले दिन द्वादशी के पारण समय में स्नान कर भगवान विष्णु की आरती करें और सात्त्विक भोजन ग्रहण करके व्रत पूरा करें।

Varuthini Ekadashi Vrat Rules – व्रत के नियम

इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, प्याज-लहसुन, तामसिक भोजन, मांसाहार, शराब और नकारात्मक व्यवहार का त्याग आवश्यक है। व्रत के दौरान सत्य, अहिंसा, संयम और दया का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना या क्रोध, ईर्ष्या, लोभ जैसे दोषों को मन में रखना व्रजित है।

दिनभर मन को शांत रखें, भगवान विष्णु का स्मरण करें और सात्त्विकता अपनाएँ। दान, सेवा, सत्संग और भजन करने से व्रत का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। द्वादशी पारण का सही समय पालन करना इस व्रत की सिद्धि का मुख्य नियम है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
विष्णु पूजा, जप और ध्यानतामसिक भोजन व प्याज-लहसुन
सात्त्विक आचरण और फलाहारअनाज, चावल, दाल का सेवन
दान, सेवा और भजनक्रोध, झूठ, विवाद
दीपदान और सत्संगनकारात्मक विचार
रात्रि में ध्यानबुरे कर्म व गलत गतिविधियाँ

FAQs - Varuthini Ekadashi Vrat

Q1. Varuthini Ekadashi 2026 का सबसे बड़ा महत्व क्या है?
Varuthini Ekadashi 2026 साधक को सुरक्षा, सौभाग्य, पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है। यह व्रत जीवन से अभिशापों, कष्टों और बाधाओं को दूर करता है और मानसिक शांति देता है।
Varuthini Ekadashi Vrat Katha राजा मान्धाता की पीड़ा और उनकी मुक्ति को दर्शाती है। यह सिखाती है कि व्रत, भक्ति और ईश्वर का स्मरण किसी भी संकट को दूर कर सकता है, चाहे वह कितना भी पुराना या गंभीर क्यों न हो।
हाँ, फल, दूध, मेवा और सात्त्विक पदार्थ ग्रहण किए जा सकते हैं। अनाज, चावल, दाल और सभी तामसिक भोजन वर्जित हैं। फलाहार मन को हल्का रखता है और साधक को पूजा में अधिक केंद्रित रहने में मदद करता है।
Varuthini Ekadashi Vrat उन लोगों के लिए अत्यंत शुभ है जो कठिनाइयों, संकट, रोग, मानसिक तनाव या जीवन की नकारात्मक परिस्थितियों से जूझ रहे हों। यह व्रत सुरक्षा ढाल की तरह कार्य करता है।
द्वादशी पारण समय में स्नान, विष्णु पूजा और सात्त्विक भोजन से व्रत खोलना चाहिए। पारण समय का पालन करना शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है क्योंकि व्रत का पूर्ण फल उसी से मिलता है।

वरूथिनी एकादशी कथा – YouTube वीडियो

Realetd Post