अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अत्यंत पुण्यदायी, महापापों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी मानी जाती है। ‘अपरा’ का अर्थ होता है, असीम या अनंत फल देने वाली। शास्त्रों में वर्णित है कि Apara Ekadashi का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में संचित सभी प्रकार के पाप, दोष, बाधाएँ, कर्मिक बंधन और नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है जो अपने जीवन में दुख, भय, दुर्भाग्य, आर्थिक समस्याएँ, मानसिक तनाव या आध्यात्मिक अवरोधों का सामना कर रहे हों।
पुराणों के अनुसार इसी व्रत के प्रभाव से पापी राजा और असंख्य लोगों को मुक्ति मिली है। यह व्रत दान, पवित्रता और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। ऐसा कहा गया है कि Apara Ekadashi व्रत का फल रथयात्रा, तीर्थयात्रा, दान, हवन और बड़े यज्ञों के फल के समान होता है। यह व्रत अपने तेज से साधक के जीवन को प्रकाशमय बनाता है और उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
| विवरण | समय / तिथि |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 11 मई 2026, सुबह 11:28 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 12 मई 2026, सुबह 09:45 बजे |
| पारण का समय | 13 मई 2026, सुबह 06:18 बजे से 08:32 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 13 मई 2026, शाम 07:05 बजे |
द्वापर युग में एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा:
हे प्रभु! कृपया मुझे ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का महत्व और उसकी कथा सुनाएँ। कौन-सा व्रत मनुष्य के महापापों का नाश कर उसे परम यश और मोक्ष प्रदान करता है?
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले:
हे धर्मराज! यह एकादशी अपरा एकादशी कहलाती है। यह पापों को नष्ट करने वाली और मोक्ष देने वाली है। इसकी कथा अद्भुत और प्रेरणादायी है।
भगवान ने बताया कि प्राचीन समय में महिष्मति नगरी में सुमतिशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत विद्वान था, लेकिन दुर्भाग्यवश वह पापों और मोह में फँसकर अधर्म के मार्ग पर चला गया। वह चोरी करता, झूठ बोलता और गलत तरीके से धन अर्जित करता था। समय के साथ उसके भीतर की बुद्धि और विवेक नष्ट हो गए।
एक दिन शहर के लोगों ने उसे पापकर्म करते पकड़ा और राजा के सामने प्रस्तुत किया। राजा ने उसे देश से बाहर निकाल दिया। सुमतिशर्मा दुखी होकर जंगल में भटकने लगा। भूख-प्यास से तड़पता हुआ वह एक दिन एक ऋषि के आश्रम पहुँचा। उसकी हालत देखकर ऋषि ने उसे शांति दी और पूछा कि वह किस कष्ट से घिरा है।
सुमतिशर्मा रोते हुए बोला
गुरुदेव! मैंने जीवन में अनेक पाप किए हैं। क्या मेरे लिए कोई मुक्ति का मार्ग है?
ऋषि ने करुणा से कहा
हे ब्राह्मण! यदि तू सच्चे मन से Apara Ekadashi Vrat करेगा तो तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। यह व्रत सबसे बड़े पापी को भी पवित्र बना देता है। इसका फल अनगिनत यज्ञों के बराबर है।
अगले दिन जब अपरा एकादशी आई, सुमतिशर्मा ने पूरे नियम से व्रत किया। उसने उपवास रखा, सत्य का पालन किया, दान किया और भगवान विष्णु का नाम जपा। व्रत पूरा होते ही उसके हृदय में प्रकाश फूटा, उसकी बुद्धि शुद्ध हुई और मन पवित्र हो गया। धीरे-धीरे उसके पापकर्म समाप्त हो गए और वह पुनः पुण्यात्मा बन गया।
भगवान श्रीकृष्ण बोले
हे युधिष्ठिर! उसी दिन से यह व्रत अपर पापों का नाश करने वाला कहलाने लगा। जो इस व्रत को करता है, उसके जीवन से सभी पाप मिट जाते हैं और वह परम सुख, यश और मोक्ष प्राप्त करता है।
अपरा एकादशी की पूजा का आरंभ प्रातः स्नान और स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होता है। घर में भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल से शुद्ध करें। पूजा में चंदन, धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, तुलसी, फल और पंचामृत का प्रयोग करें।
व्रत करने वाला व्यक्ति Apara Ekadashi का संकल्प लेकर दिनभर सत्य, संयम और पवित्रता का पालन करे। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप अत्यंत शुभ माना गया है। शाम के समय दीपदान करें, भजन-कीर्तन करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
पूरे दिन तामसिक विचार, क्रोध, विवाद, नकारात्मकता और पापकर्मों से दूर रहें। अगले दिन द्वादशी को पारण समय में भगवान की आरती कर व्रत पूरा करें।
इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, प्याज, लहसुन, मांसाहार और तामसिक भोजन पूरी तरह वर्जित है। मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है। दिनभर दया, करुणा, सत्य, संयम और सेवा का पालन करें।
किसी भी जीव को कष्ट न दें। दान और भजन-कीर्तन से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। रात्रि में ध्यान और प्रभु स्मरण करना अत्यंत शुभ है। द्वादशी पारण समय का पालन व्रत की सिद्धि के लिए आवश्यक माना जाता है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| विष्णु पूजा और जप | अनाज, चावल, दाल |
| सात्त्विक विचार | मांसाहार व मद्य |
| दान-पुण्य और सेवा | क्रोध, गलत व्यवहार |
| दीपदान और पाठ | नकारात्मक विचार |
| फलाहार और संयम | अधार्मिक कार्य |