परमा एकादशी एक अत्यंत दुर्लभ और विशेष एकादशी है, जो केवल अधिमास (मलमास) में होती है। यह एकादशी इतनी शक्तिशाली मानी गई है कि इसके व्रत से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं, दुर्भाग्य समाप्त होता है और जीवन में सौभाग्य, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुलता है। Parama Ekadashi उन लोगों के लिए अत्यंत शुभ है जो मनोकामना पूर्ति, पापों के नाश, ग्रहदोष शांति, परिवारिक सुख, आर्थिक उन्नति और बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं।
पुराणों में वर्णित है कि परमा एकादशी व्रत के प्रभाव से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। यह व्रत साधक को नए अवसर, नई ऊर्जा और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन प्रदान करता है। विशेष रूप से यह एकादशी उन लोगों को अत्यधिक लाभ देती है जिनके जीवन में लंबे समय से अड़चनें, अवरोध, कष्ट, मानसिक अशांति या नकारात्मक ऊर्जा बनी हुई हो। यह व्रत मन को शुद्ध करके साधक को ईश्वर के अत्यंत निकट ले जाता है।
| विवरण | समय / तिथि |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 14 सितंबर 2026, रात 02:30 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 15 सितंबर 2026, रात 12:40 बजे |
| पारण का समय | 16 सितंबर 2026, सुबह 06:24 बजे से 08:46 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 16 सितंबर 2026, शाम 07:15 बजे |
पुराणों में वर्णित है कि विदर्भ देश में सुमेधा नामक एक अत्यंत धर्मप्रिय, सत्यनिष्ठ और सदाचारी ब्राह्मण रहता था। सुमेधा विद्वान था, परंतु अत्यधिक गरीब था। उसका जीवन धन-संपत्ति से वंचित था, लेकिन वह कभी भी अधर्म या गलत मार्ग पर नहीं चला। उसकी पत्नी पावनरुचि भी उतनी ही पतिव्रता, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ स्त्री थी। भले ही उनके घर में भोजन का अभाव रहता था, परंतु दोनों ने कभी सत्य और नैतिकता का मार्ग नहीं छोड़ा। समय बीतता गया, गरीबी बढ़ती गई, और दोनों का जीवन अत्यंत कठिन होता चला गया।
एक दिन पावनरुचि ने दुखी होकर कहा—“स्वामी, मैं आपके साथ हर परिस्थिति में हूँ, लेकिन क्या कोई ऐसा उपाय नहीं जिससे हमारा जीवन थोड़ा सहज हो सके?” सुमेधा ने विनम्र स्वर में कहा—“प्रिये, मैं जानता हूँ कि जीवन कठिन है, परंतु मैं कभी भी अधर्म का मार्ग नहीं अपना सकता।”
इसी बीच एक दिन अत्यंत तेजस्वी और विद्वान ऋषि कौण्डिन्य उस क्षेत्र में आए। उन्होंने दंपती को देखा और उनकी अत्यंत दयनीय अवस्था पर करुणा हुई।
ऋषि ने पूछा:
हे ब्राह्मण! तुम दोनों इतने दु:खी क्यों दिखाई देते हो?
सुमेधा ने नम्र स्वर में अपनी गरीबी और कठिन परिस्थिति को बताया। उसने कहा:
गुरुदेव, मुझे मेरे पापों का ही फल मिल रहा है। मैं न तो चोरी कर सकता हूँ, न झूठ बोल सकता हूँ, न ही किसी का अपमान। मैं सत्य पर ही जीना चाहता हूँ।
यह सुनकर ऋषि कौण्डिन्य अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले – हे सुमेधा, तुम्हारी गरीबी का कारण पाप नहीं, बल्कि तुम्हारी परीक्षा है। तुम्हारे जीवन की समस्याओं का समाधान किसी साधारण पूजा या तप में नहीं, बल्कि एक विशेष व्रत में है – परमा एकादशी व्रत। यह एकादशी केवल अधिमास में आती है और इसका फल असाधारण होता है। इसे करने से मनुष्य के जन्मों-जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का उदय होता है।
जब परमा एकादशी का पावन दिन आया, सुमेधा और पावनरुचि ने पूरे विधि-विधान से व्रत किया। उन्होंने सुबह स्नान किया, स्वच्छ वस्त्र धारण किए, भगवान विष्णु की पूजा की, मंत्रजप किया और दिनभर निर्जल या फलाहार उपवास रखा। उनका मन भक्ति, पवित्रता और पूर्ण विश्वास से भरा हुआ था। रात्रि में जागरण किया और भगवान का भजन गाया। अगली सुबह द्वादशी के पारण समय में उन्होंने विधिपूर्वक व्रत पूरा किया।
उसी क्षण उनके घर में दिव्य प्रकाश फैल गया। अचानक आकाशवाणी हुई:
हे सुमेधा! परमा एकादशी के प्रभाव से तुम्हारे जीवन की सारी बाधाएँ, पाप और दुख समाप्त हो गए हैं। आज से तुम्हारे घर में धन, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होगा। और फिर कुछ ही दिनों में उनके घर में अन्न, धन और वैभव बहने लगा। वह निर्धनता जो वर्षों से उनका पीछा कर रही थी, वह पूर्ण रूप से समाप्त हो गई।
इसी कारण शास्त्रों में लिखा गया है कि Parama Ekadashi Vrat मनुष्य को परम फल देने वाला, सभी दुखों को दूर करने वाला, बाधाओं का नाश करने वाला और भाग्य को उज्ज्वल करने वाला माना जाता है। यह एकादशी कठोर तप, हज़ारों यज्ञ और अनेक दानों के बराबर फल देने वाली है। जो व्यक्ति इसे श्रद्धा और भक्ति से करता है, उसका जीवन बदल जाता है और ईश्वर की अनंत कृपा उस पर बरसती है।
प्रातः काल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। गंगाजल से शुद्धिकरण करें और चंदन, रोली, अक्षत, धूप, दीप, फूल, तुलसी आणि फल अर्पित करें। Parama Ekadashi 2026 का संकल्प लेकर दिनभर उपवास करें। विष्णु सहस्रनाम, नारायण कवच और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप अत्यंत शुभ है।
दिनभर सात्त्विकता, शांति और सत्य का पालन करें। रात्रि में जागरण, भजन या ध्यान करना अत्यधिक पुण्यदायी माना गया है। अगले दिन द्वादशी के शुभ पारण समय में पूजा कर व्रत पूर्ण करें।
इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, नमक, प्याज, लहसुन, मांसाहार और मद्य का पूर्ण त्याग करना चाहिए। मन, वचन और कर्म तीनों से सात्त्विकता बनाए रखें। क्रोध, विवाद, हिंसा और नकारात्मक विचारों से दूर रहें। फलाहार, दूध, मेवा और सात्त्विक पदार्थ ग्रहण किए जा सकते हैं।
दान-पुण्य करना, भूखे को भोजन देना, सत्संग सुनना और आध्यात्मिक ग्रंथों का पाठ करना व्रत को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है। पारण समय का पालन अनिवार्य है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| विष्णु पूजा और मंत्रजप | अनाज, दाल, चावल |
| फलाहार और सात्त्विक आहार | मांसाहार, शराब |
| दान-पुण्य और सेवा | क्रोध, झूठ |
| दीपदान और भजन | नकारात्मक विचार |
| रात्रि जागरण | तामसिक व्यवहार |