Nirjala Ekadashi 2026 – तिथि, कथा, महत्व, पूजा विधि और उपवास नियम

Nirjala Ekadashi Vrat Katha – Complete Story in Hindi

निर्जला एकादशी वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कठिन एकादशी मानी जाती है। यह एकादशी पूरे वर्ष की सभी 24 एकादशियों का फल एक साथ प्रदान करती है। इसी कारण इसे भीम एकादशी, पाप-नाशिनी एकादशी, महाफलदायिनी एकादशी, और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी भी कहा जाता है। शास्त्रों में लिखा गया है कि Nirjala Ekadashi का व्रत करने से मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त हो जाता है और उसके जीवन में दिव्य ऊर्जा, सुख, सौभाग्य, स्वास्थ्य और ईश्वर की कृपा का वास होता है।

निर्जला व्रत का सबसे प्रमुख तत्व है — पूर्ण निराहार और निरजल उपवास। इसका अर्थ है कि साधक को एकादशी के दिन न भोजन करना है, न जल ग्रहण करना है। यह व्रत तप, त्याग, शक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम माना जाता है। जो लोग पूरे वर्ष की एकादशियाँ नहीं कर सकते, वे केवल निर्जला एकादशी करके संपूर्ण फल पा सकते हैं। इसलिए यह व्रत आज भी बेहद श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है।

Nirjala Ekadashi 2026 – तिथि, मुहूर्त व पारण समय

विवरणसमय / तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ02 जून 2026, दोपहर 01:55 बजे
एकादशी तिथि समाप्त03 जून 2026, दोपहर 12:40 बजे
पारण का समय04 जून 2026, सुबह 06:12 बजे से 08:28 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त04 जून 2026, शाम 04:58 बजे

Nirjala Ekadashi Vrat Katha – निर्जला एकादशी की सम्पूर्ण विस्तृत कथा

पुराणों में वर्णित है कि पाण्डवों में भीमसेन अत्यंत बलवान, पराक्रमी और महाशक्तिशाली थे। वे अनंत बल के स्वामी तो थे, परंतु एक समस्या हमेशा उन्हें परेशान करती थी, उन्हें अत्यधिक भूख लगती थी।

इस कारण वे वर्ष भर आने वाली किसी भी एकादशी का व्रत पूर्ण रूप से नहीं रख पाते थे। युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता कुन्ती सभी एकादशी का पालन करते थे, लेकिन भीमसेन अपनी शारीरिक शक्ति और भूख के कारण उपवास नहीं कर पाते थे। धीरे-धीरे यह बात उनके मन में चिंता का कारण बन गई कि यदि वे एकादशी व्रत नहीं कर पाए, तो उन्हें उन पुण्यों का लाभ कैसे मिलेगा जो भगवान विष्णु के भक्तों को प्राप्त होता है।

एक दिन भीमसेन दुखी होकर व्यासजी के पास पहुँचे और बोले:
गुरुदेव! मैं सभी धर्मों का पालन करता हूँ, दान-पुण्य करता हूँ, परन्तु एकादशी व्रत नहीं रख पाता। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे सभी एकादशियों का फल मिल सके।

व्यासजी मुस्कुराए और बोले:
हे भीम! तुम्हारे लिए एक ही उपाय है – निर्जला एकादशी का व्रत। इस एकादशी में यदि मनुष्य पूरे दिन बिना भोजन और बिना जल के रहता है, तो पूरे वर्ष की 24 एकादशियों का फल एक साथ प्राप्त होता है।

यह सुनकर भीमसेन हतप्रभ रह गए। उन्होंने कहा: गुरुदेव, बिना भोजन तो किसी तरह चल जाएगा, परंतु बिना पानी के रहना मेरे लिए अत्यंत कठिन है।”

तब व्यासजी बोले: हे वायुपुत्र! यदि तुम मोक्ष, पुण्य और प्रभु की कृपा चाहते हो, तो इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। यह सबसे कठिन, परंतु सबसे फलदायी व्रत है। यदि तुम इसे पूरा कर लेते हो तो तुम्हें संपूर्ण एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होगा।”

भीमसेन ने गुरु का आदेश स्वीकार किया और निर्जला एकादशी आने पर दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने प्रातः स्नान किया, भगवान विष्णु को प्रणाम किया और पूरे दिन न भोजन ग्रहण किया, न जल। दिन बढ़ने के साथ उनकी प्यास बढ़ने लगी, शरीर दुर्बल होने लगा, परंतु मन में दृढ़ता बनी रही। रात होते-होते उनकी हालत अत्यंत कमजोर हो गई, परंतु उन्होंने संकल्प नहीं छोड़ा।अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद शुद्ध जल पान कर उन्होंने पारण किया। उसी क्षण ऐसा लगा जैसे उनके शरीर में पुनः ऊर्जा का संचार हो गया हो।

आकाश से आवाज आई: हे भीम! तुम्हारा व्रत सफल हुआ। आज से निर्जला एकादशी करने वाला व्यक्ति संपूर्ण एकादशियों का फल प्राप्त करेगा। यह एकादशी मोक्षदायिनी, पाप-हरिणी और कल्याणकारी है।

भीमसेन की निष्ठा और दृढ़ संकल्प के कारण यह एकादशी भीम एकादशी भी कहलाती है। यह व्रत उन लोगों के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, जो सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते। शास्त्रों में लिखा है कि निर्जला एकादशी मात्र व्रत नहीं बल्कि तप, साहस, दृढ़ता और भक्ति का अद्वितीय संगम है। इस व्रत का पालन करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्त होकर जीवन में दिव्य ऊर्जा, सौभाग्य और मोक्ष का अधिकारी बनता है।

Nirjala Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

निर्जला एकादशी के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ, हल्के तथा सात्त्विक वस्त्र पहनें। घर के मंदिर को गंगाजल से शुद्ध करें और भगवान विष्णु व तुलसी माता की स्थापना करें। पूजा में चंदन, धूप, दीप, पुष्प, तुलसी-दल, फल, धान्य, और पंचामृत का उपयोग करें। सबसे पहले दीप प्रज्ज्वलित करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार जप करें। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम, नारायण कवच या गोविंद स्तुति का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

निर्जला व्रत में भोजन और जल का त्याग व्रत का मुख्य अंग है, इसलिए पूजा के दौरान व्रत का संकल्प लें और ईश्वर से शक्ति व धैर्य की प्रार्थना करें। दिनभर शांत मन से जप, पाठ, भजन-कीर्तन और ध्यान करते रहें। रात्रि में जागरण करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन जलदान, अन्नदान या किसी पवित्र कार्य में सहयोग करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

Nirjala Ekadashi Vrat Rules – व्रत के नियम

निर्जला एकादशी व्रत पूरे वर्ष की 24 एकादशियों का फल देने वाला माना जाता है, इसलिए इसके नियम भी अत्यंत कठोर और पवित्र हैं। इस व्रत में साधक को सुबह से अगले दिन पारण तक भोजन और जल दोनों का पूर्ण त्याग करना होता है—इसीलिए इसे ‘निर्जल’ व्रत कहा गया है। साधक को पूरे दिन मन, वचन और कर्म से सात्त्विकता का पालन करना चाहिए। क्रोध, निंदा, झूठ, आलस्य, तामसिक भोजन, वाद-विवाद और किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचारों से दूर रहना आवश्यक है।

कमजोर, बीमार, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए फलाहार या जल के साथ व्रत की अनुमति है—क्योंकि भावना और संकल्प सबसे बड़ा फल देता है। दिनभर दान, विशेषकर जलदान और गौदान, अत्यंत शुभ माना गया है। द्वादशी तिथि में पारण समय का पालन अत्यंत आवश्यक है—क्योंकि पारण सही समय पर न किया जाए तो व्रत अपूर्ण माना जाता है। इस व्रत में साधक का धैर्य, संकल्प, भक्ति और आत्मसंयम ही उसे महान फल प्रदान करते हैं।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
विष्णु पूजा और जपभोजन, फल, जल
दान—विशेषकर जलदाननिंदा, क्रोध
रात्रि जागरणतामसिक भोजन
ध्यान, मंत्रजापविवाद-विवाद
सात्त्विक मन रखनाआलस्य और नकारात्मक विचार

FAQs - Nirjala Ekadashi Vrat

Q1. Nirjala Ekadashi 2026 करने का मुख्य लाभ क्या है?
निर्जला एकादशी वर्ष की सबसे शक्तिशाली एकादशी है, जो सभी 24 एकादशियों का एक साथ फल देती है। यह पापों का नाश करती है, मानसिक शक्ति बढ़ाती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। यह व्रत साधक को दिव्य ऊर्जा और सौभाग्य प्रदान करता है।
भीमसेन अत्यधिक भूख के कारण अन्य एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। व्यासजी ने उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत सुझाया और उन्होंने पूरे दिन जल-त्याग के साथ इसे पूरा किया। तभी से यह व्रत भीम एकादशी नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह व्रत कठिन है और केवल स्वस्थ लोग ही इसे कर सकते हैं। बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और कमजोर लोग फलाहार या जल के साथ व्रत कर सकते हैं। भावना और संकल्प सर्वोपरि है।
तुलसी अर्पण, विष्णु सहस्रनाम पाठ, जलदान और मंत्रजप इस व्रत को अत्यंत फलदायी बनाते हैं। रात्रि जागरण और शांत चित्त से भजन-कीर्तन करना विशेष पुण्य देता है।
द्वादशी के शुभ पारण समय में तुलसी जल ग्रहण करके व्रत तोड़ा जाता है। पारण समय का पालन अनिवार्य है, क्योंकि इसी से व्रत की सिद्धि और पूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं।

निर्जला एकादशी कथा – YouTube वीडियो

Realetd Post