पूर्वकल्प में आरुणि नाम से विख्यात एक महान् तपस्वी ब्राह्मण थे। वे किसी उद्देश्य से तप करने के लिये वन में गये और वहाँ उपवास पूर्वक तपस्या करने लगे। उन्होंने देविका नदी के सुन्दर तटपर अपना आश्रम बनाया था। एक दिन वे स्नान-पूजा करने के विचार से नदी के तटपर गये। वहाँ स्नान करके जब वे जप कर रहे थे, उसी समय उन्होंने सामने से आते हुए एक भयंकर व्याध को देखा, जो हाथ में बड़ा-सा धनुष लिये हुए था। उसकी आँखें बड़ी क्रूर थीं।
वह उन ब्राह्मण के वल्कल-वस्त्र छीनने और उन्हें मारने के विचार से आया था। उस ब्रह्मघाती को देखकर आरुणि के मन में घबराहट उत्पन्न हो गयी और वे भय से थरथर काँपने लगे, किंतु ब्राह्मण के अन्तःशरीर में भगवान् नारायण को देखकर वह व्याध डर-सा गया। उसने उसी क्षण धनुष और बाण हाथ से गिरा दिया और कहा- ‘ब्रह्मन् ! मैं आपको मारने के विचार से ही यहाँ आया था, किंतु आपको देखते ही पता नहीं मेरी वह क्रूर-बुद्धि अब कहाँ चली गयी। विप्र वर ! मेरा जीवन सदा पाप करने में ही बीता है।
अब तक मेरे द्वारा हजारों ब्राह्मण मृत्यु के मुख में प्रविष्ट हो चुके हैं। प्रायः दस हजार साध्वी स्त्रियों का भी मैंने अन्त कर डाला है। अहो ! ब्राह्मण की हत्या करनेवा ला मैं पापी पता नहीं किस गति को प्राप्त होऊँगा ? महाभाग ! अब आपके पास रहकर मैं भी तप करना चाहता हूँ। आप कृपया उपदेश देकर मेरा उद्धार करें।’
व्याध के इस प्रकार कहने पर उसे ब्रह्मघाती एवं महान् पापी समझकर द्विज श्रेष्ठ आरुणि ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन हृदय में धर्म की अभिलाषा जग जाने के कारण ब्राह्मण के कुछ न कहने पर भी वह व्याध वहीं ठहर गया। आरुणि भी नदी में स्नानकर वृक्ष के नीचे बैठे हुए तप करते रहे। इस प्रकार अब उन दोनों का नियमित धार्मिक कार्यक्रम चलने लगा। इसी प्रकार कुछ दिन बीते गए। एक दिन की बात है-आरुणि स्नान करने के लिये नदी के जल में घुसे थे, तबतक कोई भूख से व्याकुल बाघ उन शान्त स्वरूप मुनि को मारने के लिये आ पहुँचा। पर इसी बीच व्याध ने बाघको मार डाला। उस बाघ के शरीर से एक पुरुष निकला। बात ऐसी थी-जिस समय आरुणि जल में थे और बाघ उन पर झपटा, उस समय घबराहट के कारण मुनि के मुँह से सहसा ॐ नमो नारायणाय यह मन्त्र निकल पड़ा। तब तक बाघ के प्राण कण्ठ गत ही थे, अतः उसने यह मन्त्र सुन लिया। प्राण निकलते समय केवल इस मन्त्र को सुन लेने से वह एक दिव्य पुरुष के रूपमें परिणत हो गया। तब उसने कहा- ‘द्विजवर ! जहाँ भगवान् विष्णु विराजमान हैं, मैं वहीं जा रहा हूँ। आपकी कृपा से मेरे सारे पाप धूल गए। अब मैं शुद्ध एवं कृतार्थ हो गया।’
इस प्रकार उस पुरुष के कहने पर विप्रवर आरुणि ने उससे पूछा- ‘नरश्रेष्ठ ! तुम कौन हो?’ तब वह पूर्वजन्म की आप-बीती बात कहने लगा – ‘मुने ! मैं पूर्वजन्म में ‘दीर्घबाहु’ नाम से प्रसिद्ध एक राजा था। समस्त वेद और सम्पूर्ण धर्मशास्त्र मुझे सम्यक् प्रकार से अभ्यस्त थे। अन्य शास्त्र भी मुझसे अपरिचित नहीं थे। पर अन्य ब्राह्मणों से मेरा कोई प्रयोजन न था। मैं प्रायः ब्राह्मणों का अपमान भी कर देता था। मेरे इस व्यवहार से सभी ब्राह्मण कुद्ध हो गये और उन्होंने मुझे शाप दे दिया – तू अत्यन्त निर्दयी बाघ होगा, क्योंकि तेरे द्वारा ब्राह्मणों का महान् अनादर हो रहा है। तुझे किसी बातका स्मरण भी न रहेगा।’
विप्रवर ! वे सभी ब्राह्मण वेद के पारगामी विद्वान् थे। उनका घोर शाप मुझे लग गया। मुने ! जब ब्राह्मणों ने शाप दिया तो मैं उनके पैरोंपर गिर पड़ा तथा उनसे कृपा पूर्वक क्षमा की भीख माँगी। मुझ पर उनकी कृपादृष्टि हो गयी। अतएव उन्होंने मेरे उद्धार की भी बात बताते हुए कहा – प्रत्येक छठे दिन मध्याह्न काल में तुझे जो कोई मिले, उसे तू खा जाना – वह तेरा आहार होगा। जब तुझे बाण लगेगा और उसके आघात से तेरे प्राण कण्ठ में आ जायँ, उस समय किसी ब्राह्मण के मुखसे जब ‘ॐ नमो नारायणाय’ यह मन्त्र तेरे कानों में पड़ेगा, तब तुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जायगी – इसमें कोई संशय नहीं, मुने ! मैंने दूसरे के मुख से भगवान् विष्णुका यह नाम सुना है। जिसके परिणाम स्वरूप मुझ ब्रह्मद्वेषी को भी भगवान् नारायण का दर्शन सुलभ हो गया। फिर जो अपने मुँहसे ‘ॐ हरये नमः’ इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्राणों का त्याग करता है, वह परम पवित्र पुरुष जीते-जी ही मुक्त है।
मैं भुजा उठाकर बार-बार कहता हूँ – यह सत्य है, सत्य है और निश्चय ही सत्य है। ब्राह्मण चलते – फिरते देवता हैं। भगवान् पुरुषोत्तम कूटस्थ पुरुष हैं।
ऐसा कहकर शुद्ध अन्तः करणवाला वह बाघ (दिव्य पुरुष) स्वर्ग चला गया और आरुणि भी बाघ के पंजे से छूटकर व्याध से कहने लगे- ‘आज बाघ मुझे खाने के लिये उद्यत हो गया था। ऐसे अवसर पर तुमने मेरी रक्षा की है। अत एव उत्तम व्रत का पालन करनेवाले वत्स ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे वर माँगो।’
व्याधने कहा – ‘ब्राह्मणदेव ! मेरे लिये यही वर पर्याप्त है, जो आप प्रेम पूर्वक मुझ से बातें कर रहे हैं। भला, आप ही बताइये, इससे अधिक वर लेकर मुझे करना ही क्या है?’
आरुणिने कहा – ‘व्याध ! तुम्हारी तपस्या करने की इच्छा थी, अत एव तुमने मुझसे प्रार्थना की थी, किंतु अनघ ! उस समय तुम में अनेक प्रकार के पाप थे। तुम्हारा रूप बड़ा भयंकर था, परंतु अब तुम्हारा अन्तः करण परम पवित्र हो गया है, क्योंकि देविका नदीमें स्नान करने, मेरा दर्शन करने तथा चिर काल तक भगवान् विष्णुका नाम सुनने से तुम्हारे पाप नष्ट हो गये हैं, इसमें कोई संशय नहीं ।
साधो ! अब मेरा यह एक वर स्वीकार कर लो कि तुम अब यहीं रहकर तपस्या करो; क्योंकि तुम इसके लिये बहुत पहले से इच्छुक भी थे।’
इस प्रकार नारायण – मन्त्र के प्रभाव से पापरहित हुआ व्याध आरुणि मुनि की आज्ञा से वहीं रहकर तप करने लगा।
हाँ, पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान का नाम सुनने मात्र से भी पाप नष्ट हो सकते हैं। आरुणि मुनि की कथा में बाघ ने केवल “ॐ नमो नारायणाय” सुनकर मोक्ष प्राप्त किया।
यह मंत्र भगवान विष्णु का सीधा स्मरण है। इसका श्रवण, जप या स्मरण मन को शुद्ध करता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
हाँ, यदि पापी व्यक्ति को सच्चा पश्चाताप हो जाए और भगवान के नाम या भक्त की संगति मिल जाए, तो भगवान उस पर भी कृपा करते हैं। व्याध का उद्धार इसका उदाहरण है।
क्योंकि ब्राह्मण वेद, मंत्र और ईश्वर-स्मरण का प्रतीक होता है। उसकी वाणी से निकला मंत्र भी जीव के उद्धार का कारण बन सकता है, जैसा इस कथा में दिखाया गया है।
इस कथा का मुख्य संदेश यह है कि भगवान का नाम, श्रद्धा और भक्त की संगति जीवन को बदल सकती है। मोक्ष केवल बड़े कर्मों से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति से मिलता है।