रात का समय था। चारों ओर एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था, जिसमें हल्की ठंडी हवा बह रही थी और आकाश में टिमटिमाते तारे चमक रहे थे। दिनभर की उलझनें, अधूरे विचार और मन का बोझ जैसे नींद को दूर भगा रहे थे। तभी मोबाइल पर अपनेआप एक गंभीर-सी आवाज़ गूंज उठी, जिसने मेरी एकाग्रता को तोड़ दिया।
वह कोई साधारण भजन नहीं था, बल्कि शिव कथा का प्रारंभ था। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ी, मन की बेचैनी धीरे-धीरे शांति में बदलने लगी। उसी क्षण समझ आया कि Bhajan Katha केवल सुनने की चीज़ नहीं, बल्कि आत्मा को जगाने वाली अनुभूति है। और जब कथा भगवान शिव की हो, तो वह केवल कथा नहीं रहती वह चेतना की यात्रा बन जाती है।
पुराणों में शिव–पार्वती विवाह को केवल एक दिव्य विवाह नहीं माना गया, बल्कि इसे चेतना शिव और शक्ति पार्वती के मिलन का प्रतीक कहा गया है।
कथा के अनुसार, भगवान शिव तपस्या में लीन थे निराकार, निर्विकार, संसार से परे। वहीं माता पार्वती ने घोर तप करके यह सिद्ध किया कि शक्ति बिना चेतना के अधूरी है और चेतना बिना शक्ति के निष्क्रिय।
जब शिव और पार्वती का विवाह हुआ, तो यह संदेश मिला जीवन में संतुलन तभी आता है जब वैराग्य और प्रेम, ज्ञान और कर्म साथ चलते हैं।
आज भी जब भक्त यह कथा सुनते हैं, उन्हें एहसास होता है कि पारिवारिक जीवन, संबंध और जिम्मेदारियाँ कोई बंधन नहीं, बल्कि आत्मिक विकास का माध्यम हैं। यही कारण है कि bhajankatha.com पर शिव-पार्वती विवाह की कथा सुनते समय श्रोता को अपने जीवन के सवालों के उत्तर मिलने लगते हैं।
जब देवता और असुर अमृत के लिए समुद्र मंथन कर रहे थे, तब सबसे पहले निकला हलाहल विष इतना घातक कि तीनों लोक जलने लगे। कोई भी उसे ग्रहण करने को तैयार नहीं था। तभी भगवान शिव आगे आए। उन्होंने वह विष पी लिया, लेकिन उसे कंठ में ही रोक लिया। विष नीचे नहीं उतरा, इसलिए वे नीलकंठ कहलाए।
यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि गहरा जीवन-संदेश देती है।जब संसार का विष सामने आए, तो उसे भीतर मत उतरने दो।
महाशिवरात्रि पर रातभर जागरण और उपवास का यही अर्थ है। भक्त मानते हैं कि जैसे शिव ने जगत को बचाने के लिए विष पिया, वैसे ही उपवास और जागरण से हम अपने भीतर के विकारों को रोक सकते हैं। इसीलिए शिव कथा सुनते-सुनते जागरण करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक साधना बन जाता है।
शिव पुराण में ऐसे अनगिनत प्रसंग मिलते हैं जहाँ साधारण भक्तों ने केवल व्रत, उपवास और रात्रि जागरण से मोक्ष प्राप्त किया।
एक कथा में बताया गया है कि एक शिकारी अनजाने में बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाता रहा। रातभर जागरण में उसने शिव का नाम लिया और उसे अपने पापों से मुक्ति मिल गई। यह कथा सिखाती है कि – शिव भक्ति में नियम से ज़्यादा भाव मायने रखता है।
bhajankatha.com पर जब ये कथाएँ सुनाई जाती हैं, तो श्रोता को यह भरोसा मिलता है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग कठिन नहीं बस सच्चा भाव चाहिए।
भारत की लोक कथाओं में उज्जैन के महाकालेश्वर की महिमा विशेष मानी जाती है। कहा जाता है कि दुषण नाम का असुर उज्जैन में ब्राह्मणों को अत्याचार से परेशान करता था।
जब भक्तों ने शिव का आह्वान किया, तो स्वयं महाकाल प्रकट हुए और दुषण का संहार किया। तभी से उज्जैन को अवंतिका और शिव को महाकाल कहा गया जो समय और मृत्यु दोनों से परे हैं।
यह कथा आज भी बताती है कि जब अन्याय बढ़ता है, तो शिव किसी न किसी रूप में प्रकट होते ही हैं। रात, उपवास और शिव कथा का रहस्य
शिव भक्ति में रात का विशेष महत्व है। माना जाता है कि रात्रि में मन सबसे अधिक शांत और ग्रहणशील होता है। इसीलिए –
तीनों मिलकर साधक को भीतर से बदल देते हैं।
कई लोग कहते हैं कि शिव कथा सुनते समय ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति मन को थामे हुए है। यही शिव तत्व है शांति, स्थिरता और संरक्षण।
आज मंदिर दूर हो सकते हैं, पर भक्ति नहीं। bhajankatha.com जैसे मंचों ने शिव कथा को हर व्यक्ति तक पहुँचा दिया है –
अब भक्ति समय और स्थान की मोहताज नहीं रही।
भजन कथा, विशेषकर शिव कथा, केवल धार्मिक कथा नहीं यह जीवन को समझने का मार्ग है।यह सिखाती है – त्याग कैसे करें, संतुलन कैसे बनाएँ, और संकट में स्थिर कैसे रहें।
जब जीवन भारी लगे, मन उलझ जाए, या उत्तर न मिलेंतो बस शिव का नाम और उनकी कथा सुन लो। आप पाएँगे – मन शांत है, सोच स्पष्ट है,और आत्मा हल्की है। क्योंकि जहाँ शिव की कथा है, वहाँ भय नहीं केवल विश्वास होता है।