हर महीने की चतुर्थी यूँ तो कैलेंडर में एक साधारण तिथि लगती है, लेकिन जब वह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी होती है, तो कई घरों में सुबह की शुरुआत थोड़ी अलग होती है। रसोई शांत रहती है, पूजा की थाली सजी होती है, और मन में एक संकल्प लिया जाता है आज संकष्टी चतुर्थी का व्रत है।
अप्रैल की 15 तारीख को पड़ने वाली यह संकष्टी चतुर्थी भी उसी क्रम का हिस्सा है। यह मासिक व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है विघ्नहर्ता, बुद्धि और शुभारंभ के देवता। लोग मानते हैं कि इस दिन सच्ची श्रद्धा से पूजा करने पर जीवन की बाधाएँ हल्की होने लगती हैं।
भगवान गणेश को हर शुभ कार्य से पहले याद किया जाता है। कारण सरल है वे विघ्नहर्ता हैं, यानी बाधाओं को दूर करने वाले। संकष्टी शब्द स्वयं संकट से जुड़ा है। मान्यता है कि इस दिन का व्रत रखने से जीवन के संकट कम होते हैं और मानसिक उलझनें सुलझने लगती हैं।
लेकिन अगर इसे थोड़ा गहराई से देखें, तो शायद इसका अर्थ केवल बाहरी समस्याओं से नहीं है। कई बार असली विघ्न हमारे भीतर होते हैं डर, असमंजस, टालमटोल या नकारात्मक सोच। गणेश की पूजा हमें धैर्य और स्पष्टता का अभ्यास कराती है।
जब कोई व्यक्ति पूरे दिन संयम रखकर शाम को चंद्र-दर्शन करता है, तो वह केवल एक परंपरा निभा नहीं रहा होता वह अपने भीतर धैर्य का एक बीज भी बो रहा होता है।
संकष्टी चतुर्थी का व्रत सूर्योदय से शुरू होकर चंद्रमा के उदय तक रखा जाता है। कई लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार करते हैं। दिनभर भगवान गणेश का स्मरण, मंत्र-जप और पूजा की जाती है।
इस व्रत की खास बात है चंद्र-दर्शन। शाम को जब चाँद दिखाई देता है, तो उसे अर्घ्य दिया जाता है और फिर व्रत खोला जाता है। यह क्षण खास होता है दिनभर के संयम के बाद एक शांत संतोष महसूस होता है।
कुछ लोग कहते हैं कि चाँद को देखने के बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है। यह प्रतीकात्मक भी है अंधकार के बाद उजाले की प्रतीक्षा जैसा।
संकष्टी चतुर्थी के दिन कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा है। इस कथा में बताया जाता है कि कैसे भगवान गणेश ने अपने भक्तों के संकट दूर किए। हर महीने की संकष्टी का एक अलग नाम और विशेष रूप होता है। कुछ संकष्टी चतुर्थी को विशेष रूप से अंगारकी कहा जाता है, जब यह मंगलवार को पड़ती है। उस दिन इसका महत्व और बढ़ जाता है।
गणेश के विभिन्न रूप बाल गणेश, सिद्धिविनायक, एकदंत, लंबोदर हर रूप में अलग प्रतीक छिपा है। कोई बुद्धि का प्रतीक है, कोई धैर्य का, तो कोई सफलता का। संकष्टी का दिन इन रूपों को याद करने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर बन जाता है।
इस दिन ॐ गण गणपतये नमः मंत्र का जप बहुत किया जाता है। कई लोग 108 बार जप करते हैं, तो कुछ माला लेकर बैठते हैं। मंत्र की लय मन को स्थिर करने लगती है।
गणेश जी को मोदक प्रिय माना जाता है, इसलिए व्रत खोलने के बाद मोदक या गुड़-नारियल का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कहीं-कहीं तिल के लड्डू या दूर्वा घास भी अर्पित की जाती है।
प्रसाद केवल मिठास नहीं, बल्कि साझा करने की भावना भी है। परिवार के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, और दिन की साधना का समापन होता है।
संकष्टी चतुर्थी कोई बड़ा सार्वजनिक त्योहार नहीं है। यह व्यक्तिगत साधना का दिन है शांत, संयमित और आत्ममंथन से भरा हुआ। इस व्रत का सार शायद यही है कि समस्याएँ जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें देखने का दृष्टिकोण बदला जा सकता है। गणेश की पूजा हमें यही सिखाती है पहले सुनो, फिर सोचो, फिर निर्णय लो।
जब रात को चाँद की रोशनी में व्रत खोला जाता है, तो मन में एक हल्कापन आता है। जैसे भीतर की किसी गाँठ को धीरे से खोल दिया गया हो।
संकष्टी चतुर्थी हमें हर महीने यह याद दिलाती है कि बाधाएँ चाहे कितनी भी हों, धैर्य, बुद्धि और विश्वास के साथ उन्हें पार किया जा सकता है। और शायद यही गणेश जी का सबसे बड़ा आशीर्वाद है।