दोपहर की धूप अभी तीखी नहीं हुई थी। मंदिर के ऊँचे गोपुरम पर रंगीन ध्वज लहरा रहे थे। कहीं शहनाई की मधुर धुन, कहीं वेद मंत्रों की गूंज, और कहीं फूलों से सजी पालकी की तैयारी। वातावरण में एक उत्सव का भाव था, पर यह उत्सव केवल सजावट का नहीं यह प्रेम, विश्वास और दिव्य मिलन का उत्सव था।
एक वृद्ध महिला अपनी बेटी से कह रही थी, आज पंगुनी उथिरम है आज देवताओं का विवाह होता है। उनके शब्दों में श्रद्धा थी, और उस श्रद्धा में पीढ़ियों की परंपरा। पंगुनी उथिरम केवल एक तमिल पर्व नहीं, बल्कि वैवाहिक पवित्रता और आध्यात्मिक संबंधों का प्रतीक है।
तमिल पंचांग के अनुसार पंगुनी मास मार्च–अप्रैल में जब उथिरम उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र आता है, तब यह पावन पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में पंगुनी उथिरम 1 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा।
यह वह शुभ दिन है जब कई दिव्य विवाह संपन्न हुए माने जाते हैं। इसी कारण इसे दिव्य कल्याणम अर्थात् देव विवाहों का पर्व कहा जाता है। यह दिन केवल पौराणिक घटना की स्मृति नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण के आदर्श को याद करने का अवसर है।
तमिलनाडु में पंगुनी उथिरम विशेष रूप से भगवान मुरुगन कार्तिकेय को समर्पित है। कहा जाता है कि इसी दिन उनका विवाह देवी देवसेना से हुआ था। कुछ स्थानों पर वल्ली और मुरुगन के मिलन की भी कथा सुनाई जाती है।
भक्त कवडी लेकर मंदिरों की ओर पैदल यात्रा करते हैं। कई लोग नंगे पांव चलकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण का प्रतीक है। मुरुगन साहस, धर्म और कर्तव्य के देवता माने जाते हैं। उनका विवाह केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संतुलन का भी संदेश देता है।
पंगुनी उथिरम का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह से भी जोड़ा जाता है।
इन दोनों का मिलन हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन कितना आवश्यक है। विवाह केवल भावनात्मक बंधन नहीं, बल्कि दो शक्तियों का सामंजस्य है। यह कथा हमें याद दिलाती है कि जब दो व्यक्ति एक-दूसरे के स्वभाव को स्वीकार करते हैं, तभी रिश्ता स्थायी बनता है।
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का दिव्य संबंध भी इस दिन स्मरण किया जाता है। विष्णु पालन और संरक्षण के देवता हैं, जबकि लक्ष्मी समृद्धि और सौभाग्य की प्रतीक हैं। इनका मिलन दर्शाता है कि जीवन में संतुलन केवल प्रेम से नहीं, बल्कि सहयोग और जिम्मेदारी से भी आता है। जब घर में समझ और समर्थन हो, तो वही घर मंदिर जैसा पवित्र बन जाता है।
पंगुनी उथिरम के दिन तमिलनाडु के कई मंदिरों में कल्याणम विवाह समारोह आयोजित किए जाते हैं। देव प्रतिमाओं को दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाया जाता है। फूलों की मालाएँ, रेशमी वस्त्र और स्वर्णाभूषण पूरा वातावरण मंगलमय हो उठता है। वेद मंत्रों के बीच विवाह की रस्में निभाई जाती हैं। भक्त फूल बरसाते हैं और प्रसाद वितरित किया जाता है।
मदुरै, पलानी और तिरुचेंदूर जैसे स्थानों पर भव्य शोभायात्राएँ निकलती हैं। देव प्रतिमाएँ रथों पर नगर भ्रमण करती हैं, और हजारों भक्त उनके पीछे भक्ति गीत गाते हुए चलते हैं। यह दृश्य केवल आस्था का नहीं, बल्कि सामूहिक आनंद और एकता का प्रतीक बन जाता है।
इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं। कुछ केवल फलाहार करते हैं, तो कुछ पूरा दिन जल तक ग्रहण नहीं करते। विवाहित दंपति साथ बैठकर पूजा करते हैं और अपने संबंध में प्रेम, धैर्य और विश्वास बनाए रखने का संकल्प लेते हैं। अविवाहित युवक-युवतियाँ आदर्श जीवनसाथी की कामना करते हैं।
उपवास केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि मन के अनुशासन का अभ्यास भी है। यह पर्व हमें सिखाता है कि रिश्ते केवल शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण से मजबूत होते हैं।
पंगुनी उथिरम हमें यह समझाता है कि सच्चा विवाह केवल साथ रहने का वादा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के विकास में सहभागी बनने का संकल्प है। शिव-पार्वती का संतुलन, विष्णु-लक्ष्मी का सहयोग और मुरुगन का साहस ये सभी आदर्श वैवाहिक जीवन के प्रतीक हैं। भक्ति भी एक प्रकार का मिलन है आत्मा का परमात्मा से। जब श्रद्धा सच्ची हो, तो वह संबंध भी उतना ही पवित्र हो जाता है जितना एक विवाह।
पंगुनी उथिरम हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे अपने रिश्ते कितने मजबूत हैं। क्या हम एक-दूसरे को समझते हैं? क्या हम सम्मान और धैर्य से साथ निभा रहे हैं? दिव्य विवाहों की यह स्मृति हमें प्रेरित करती है कि हम अपने जीवन में प्रेम को केवल भावना न रखें, बल्कि उसे जिम्मेदारी और विश्वास से निभाएँ।
जब संबंधों में स्वार्थ कम और समर्पण अधिक होता है, तब घर में शांति बसती है। और जब घर में शांति होती है, तो वही स्थान मंदिर बन जाता है। शायद यही पंगुनी उथिरम का सबसे गहरा संदेश है दिव्यता कहीं दूर नहीं, वह हमारे अपने रिश्तों में ही छिपी है।