नर्मदा के पवित्र तट पर अमरकंटक क्षेत्र में सोमशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम सुमना था। भगवान विष्णु की आराधना करने से सोमशर्मा के यहाँ एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम सुव्रत रखा गया।
सुव्रत पूर्व जन्म के प्रभाव से भगवान का अत्यंत भक्त था। उसने अपने सभी साथियों के नाम भी भगवान के नामों पर ही रख दिए थे। वह अपने मित्रों को केशव, गोविंद, नारायण, दामोदर आदि नामों से पुकारता था।
वह खेलने, पढ़ने, गाने, हँसने, देखने, चलने, भोजन करने तथा सोने, हर समय भगवान का ही ध्यान करता रहता था। सभी पदार्थों और सभी प्राणियों में वह भगवान का ही दर्शन करता था।
सुव्रत अपने साथियों के साथ मधुर स्वर में भगवान के नाम और गुणों का गान करता था। जब उसकी माता उसे भोजन के लिए बुलाती, तो वह कहता:
“माँ! भगवान का नाम ही अमृत के समान है। मैं उसी से तृप्त रहता हूँ, मुझे भूख नहीं लगती।”
भोजन के समय भी वह संकल्प करता:
“इस भोजन से भगवान तुष्ट हों।”
सोते समय वह कहता:
“मैं योगनिद्रापरायण भगवान श्रीकृष्ण की शरण में हूँ।”
इस प्रकार उठते-बैठते, खाते-पीते—हर समय वह भगवान वासुदेव का ध्यान करता था। वह हर वस्तु को भगवान को समर्पित करके ही उसका उपयोग करता था।
इस प्रकार उसकी सभी क्रियाएँ और उसका मन सदा भगवान में ही लगे रहते थे।
युवा होने पर सुव्रत वैद्य पर्वत पर स्थित सिद्धेश्वर तीर्थ के निर्जन वन में जाकर भगवान की प्राप्ति के लिए तपस्या करने लगा। उसने अपने मन को एकमात्र भगवान श्रीहरि के ध्यान में स्थिर कर दिया।
उसकी कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिए। सुव्रत ने भगवान की स्तुति की और वरदान माँगा:
“मेरे माता-पिता सशरीर ही आपके धाम को प्राप्त हों।”
भक्ति के प्रभाव से सुव्रत अपने माता-पिता के साथ भगवान के उस नित्य धाम को प्राप्त हो गया, जहाँ मृत्यु का कभी प्रवेश नहीं होता।