मई की उमस भरी सुबह। आसमान हल्का धुंधला, लेकिन हवा में एक अलग सी बेचैनी। केरल के त्रिशूर शहर में यह कोई साधारण दिन नहीं होता। 17 मई 2026 को मनाया जाने वाला त्रिशूर पूरम फिर से लौटेगा वही भव्यता, वही लय, वही रोमांच लेकर।
लोग इसे मदर ऑफ ऑल पूरम्स कहते हैं। लेकिन अगर आप किसी स्थानीय व्यक्ति से पूछें, तो वह शायद मुस्कुराकर कहे यह हमारा गर्व है। त्रिशूर पूरम केवल एक त्योहार नहीं है। यह एक एहसास है। एक ऐसा दिन, जब परंपरा, कला और समुदाय एक साथ सांस लेते हैं।
करीब 18वीं सदी के अंत की बात है। कोच्चि के शासक Maharaja Rama Varma ने कुछ ऐसा सोचा, जो उस समय के लिए बहुत बड़ा कदम था।
कहानी यह है कि कुछ मंदिरों को एक बड़े उत्सव में भाग लेने का अवसर नहीं मिला। यह बात राजा को सही नहीं लगी। उन्होंने तय किया कि ऐसा आयोजन होना चाहिए जहाँ सभी मंदिर बराबरी से शामिल हों। यहीं से त्रिशूर पूरम की शुरुआत हुई। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था। यह एक संदेश था कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं।
पूरम का केंद्र है Vadakkunnathan Temple। यह प्राचीन शिव मंदिर त्रिशूर के बीचों-बीच स्थित है। पूरम के दिन यहाँ इंसानों का समंदर उमड़ पड़ता है। दूर-दूर से लोग आते हैं कुछ अपने परिवार के साथ, कुछ दोस्तों के साथ, और कुछ अकेले, सिर्फ इस माहौल को महसूस करने के लिए।
जब भीड़ बढ़ती है, तब भी अजीब सी शांति रहती है। जैसे सब जानते हों कि वे किसी खास पल का हिस्सा बनने आए हैं।
त्रिशूर पूरम की सबसे पहचानने वाली छवि है सजे-धजे हाथी। उनके माथे पर चमकते सुनहरे अलंकरण, ऊपर बैठे पुजारी, हाथों में रंग-बिरंगी छतरियाँ। जब ये हाथी एक साथ खड़े होते हैं, तो वह दृश्य सचमुच सांस रोक देने वाला होता है।
भीड़ में खड़े बच्चे उत्साह से उछलते हैं। बुजुर्ग लोग गर्व से कहते हैं यह हमारी परंपरा है। लेकिन यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं है। हाथी यहाँ शक्ति, गरिमा और देवत्व के प्रतीक हैं।
फिर शुरू होता है चेंडा मेलम। पहले धीमी ताल। फिर एक-एक करके सैकड़ों कलाकार ढोल की लय में जुड़ते जाते हैं। आवाज तेज होती है। दिल की धड़कन उस लय से मेल खाने लगती है।
आप चाहें या न चाहें, आपके पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। उस पल में कोई अजनबी नहीं रहता। सब एक ही ताल पर होते हैं।
पूरम का एक बेहद खूबसूरत हिस्सा है कुडामट्टम यानी छतरियों की अदला-बदली। दो प्रमुख समूह, पारामेक्कावु और तिरुवंबाडी, अपने हाथियों के ऊपर अलग-अलग रंगों और डिज़ाइन की छतरियाँ बदलते हैं। हर नई छतरी पर भीड़ से तालियाँ और जयकार गूंज उठती है। यह प्रतिस्पर्धा नहीं है। यह कला का उत्सव है।
जब रात गहराती है, तब आसमान जगमगाने लगता है। आतिशबाज़ी शुरू होती है। रंगीन रोशनी अंधेरे को चीरती है। लोग चुपचाप ऊपर देखते हैं। कुछ पल के लिए जैसे समय रुक जाता है।
बच्चे अपने माता-पिता का हाथ कसकर पकड़ लेते हैं। कुछ लोग मोबाइल से वीडियो बनाते हैं, लेकिन कई सिर्फ आंखों से उस पल को महसूस करना पसंद करते हैं। यह सिर्फ त्योहार नहीं, एकता का प्रतीक है
यह अलग-अलग मंदिरों, समुदायों और लोगों को एक साथ लाता है। यहाँ कोई भेदभाव नहीं दिखता। जिस सोच से महाराजा राम वर्मा ने इसे शुरू किया था, वही भावना आज भी जिंदा है। पूरम हमें याद दिलाता है कि परंपराएँ हमें बांटती नहीं, जोड़ती हैं।
आज के डिजिटल दौर में भी त्रिशूर पूरम की चमक कम नहीं हुई है। हाँ, लोग तस्वीरें साझा करते हैं, लाइव वीडियो बनाते हैं। लेकिन जब आप खुद उस मैदान में खड़े होते हैं, ढोल की गूंज सुनते हैं और हाथियों की कतार देखते हैं तब समझ में आता है कि असली अनुभव स्क्रीन से कहीं बड़ा होता है।
त्रिशूर पूरम 2026 फिर आएगा। फिर वही भीड़, वही ताल, वही रोशनी। लेकिन हर साल की तरह, यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं होगा। यह याद दिलाएगा कि संस्कृति तब जीवित रहती है जब लोग उसे दिल से जीते हैं।
जब हजारों लोग एक साथ खड़े होकर एक ही लय में सांस लेते हैं, तब समझ आता है त्रिशूर पूरम सिर्फ केरल का त्योहार नहीं, एक साझा धड़कन है।