Aja Ekadashi Puja Vidhi and Importance

आज सुबह देश के कई हिस्सों में कुछ अलग सा सन्नाटा और साथ ही भक्ति की हल्की-सी गूंज महसूस हुई। वजह है अधिक मास में पड़ने वाली दुर्लभ पद्मिनी एकादशी। यह तिथि हर साल नहीं आती, बल्कि लगभग तीन साल में एक बार अधिक मास के दौरान पड़ती है। इसलिए श्रद्धालुओं के बीच इसका महत्व खास माना जाता है।

सुबह चार बजे से ही कई घरों में रोशनी जल गई थी। महिलाएँ स्नान के बाद पूजा की तैयारी में लग गईं। कहीं पीत वस्त्र निकाले गए, तो कहीं भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने ताजे फूल सजाए गए। मंदिरों में भी सामान्य दिनों की तुलना में भीड़ अधिक रही।

अधिक मास और पद्मिनी एकादशी का विशेष महत्व

अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, और यह भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि इस मास में किए गए जप, तप और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में जब इसी मास में पद्मिनी एकादशी आती है, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

स्कंद पुराण और पद्म पुराण में इस एकादशी का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक राजा और उनकी रानी संतान सुख से वंचित थे। उन्होंने ऋषियों के निर्देश पर अधिक मास की पद्मिनी एकादशी का कठोर व्रत किया। नियमपूर्वक उपवास, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और दान-पुण्य करने से उनकी मनोकामना पूरी हुई। यही कारण है कि आज भी लोग इस व्रत को विशेष आस्था से करते हैं।

सुबह से दिखी भक्ति की झलक

वाराणसी के एक पुराने विष्णु मंदिर में सुबह से श्रद्धालुओं की कतार लगी रही। लोग शांत भाव से अपनी बारी का इंतजार करते रहे। एक युवक, जो आईटी कंपनी में काम करता है, ने बताया, मैंने पहली बार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा है। ऑफिस की भागदौड़ के बीच ऐसा दिन मन को स्थिर करने का मौका देता है।

जयपुर में एक बुजुर्ग दंपत्ति हर अधिक मास में यह व्रत रखते हैं। उन्होंने कहा, हमने अपने माता-पिता से यह परंपरा सीखी है। व्रत सिर्फ शरीर का नहीं, मन का भी होता है। कोशिश रहती है कि आज के दिन किसी से कटु वचन न कहें।

कठोर उपवास और विष्णु सहस्रनाम का पाठ

कई श्रद्धालु आज निर्जला व्रत कर रहे हैं। कुछ लोग केवल फल और दूध ग्रहण कर रहे हैं। मंदिरों में विष्णु सहस्रनाम का सामूहिक पाठ किया गया। कई जगहों पर भगवद्गीता के श्लोकों का उच्चारण हुआ।

तुलसी के पत्तों का अर्पण आज विशेष रूप से देखा गया। मान्यता है कि तुलसी के बिना विष्णु पूजा अधूरी रहती है। मंदिरों में छोटे-छोटे बच्चे भी माता-पिता के साथ पूजा में शामिल हुए। अहमदाबाद के एक पुजारी ने बताया,
पद्मिनी एकादशी केवल व्रत नहीं, आत्मसंयम का अभ्यास है। आज लोग कम बोलें, कम खाएँ और अधिक स्मरण करें यही इसका सार है।

सेवा और दान की भावना

इस बार कई सामाजिक संगठनों ने पद्मिनी एकादशी के अवसर पर अन्नदान कार्यक्रम आयोजित किए। कुछ लोगों ने अस्पतालों में फल वितरित किए, तो कुछ ने गौशालाओं में चारा दान किया।

एक युवा समूह ने जरूरतमंद परिवारों को राशन किट बाँटी। समूह के एक सदस्य ने कहा, अगर व्रत के साथ सेवा जुड़ जाए तो उसका अर्थ और गहरा हो जाता है। धर्माचार्यों का कहना है कि इस दिन अहिंसा और करुणा का पालन करना भी उतना ही जरूरी है जितना उपवास।

आध्यात्मिक लाभ की मान्यता

पुराणों में उल्लेख है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत पूर्व जन्मों के कर्मों को शुद्ध करने वाला माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने वाला भक्त मृत्यु के बाद वैकुण्ठ धाम प्राप्त करता है।

हालांकि विद्वान यह भी कहते हैं कि केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि सच्ची निष्ठा और ईमानदारी भी जरूरी है। यदि व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार लाए, दूसरों के प्रति संवेदनशील बने, तो वही वास्तविक पुण्य है।

सोशल मीडिया पर भी चर्चा

आज सोशल मीडिया पर भी पद्मिनी एकादशी चर्चा का विषय बनी रही। लोगों ने अपने घर की पूजा की तस्वीरें साझा कीं। कुछ ने अपने अनुभव लिखे कि कैसे व्रत रखने से उन्हें मानसिक शांति मिलती है।

हालाँकि कई लोग इसे व्यक्तिगत आस्था का विषय मानते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि अधिक मास की यह दुर्लभ तिथि लोगों को एक बार फिर अपनी परंपराओं से जोड़ रही है।

दिन का समापन

शाम को आरती और दीप प्रज्वलन के साथ पद्मिनी एकादशी का व्रत पूर्ण होगा। कई घरों में परिवार साथ बैठकर कथा सुनेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे।

आज का दिन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी बन गया है। अधिक मास की यह दुर्लभ एकादशी लोगों को याद दिला रही है कि भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार, सेवा और संयम में भी दिखाई देती है।

पद्मिनी एकादशी 2026 ने एक बार फिर यह दिखाया कि परंपराएँ आज भी जीवित हैं बस उन्हें निभाने का भाव सच्चा होना चाहिए।

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