29 मई 2026, शुक्रवार। ज्येष्ठ महीने की तपती दोपहरों के बीच यह पूर्णिमा कुछ अलग सा सुकून लेकर आती है। चाँद पूरा होता है, गोल और शांत। और इसी पूर्णिमा को मनाई जाती है ज्येष्ठ पूर्णिमा, जिसे कई जगहों पर वट पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।
यह कोई शोर-शराबे वाला त्योहार नहीं है। इसमें पटाखे नहीं होते, बड़ी शोभायात्राएँ नहीं निकलतीं। यह दिन भीतर की आस्था, धैर्य और रिश्तों की मजबूती को महसूस करने का होता है। खासकर विवाहित महिलाओं के लिए यह दिन बहुत मायने रखता है। वे अपने पति की लंबी उम्र, परिवार की खुशहाली और रिश्तों की स्थिरता के लिए व्रत रखती हैं।
लेकिन अगर गहराई से देखा जाए, तो यह पर्व सिर्फ पति की लंबी उम्र तक सीमित नहीं है। यह प्रेम, निष्ठा और भावनात्मक ताकत की कहानी है।
इस दिन कई महिलाएँ सुबह जल्दी उठती हैं। स्नान के बाद घर में पूजा की तैयारी होती है। साफ-सुथरे कपड़े, साड़ी, हाथों में चूड़ियाँ, माथे पर सिंदूर यह सब केवल परंपरा नहीं, बल्कि मन की श्रद्धा का हिस्सा होता है।
पूजा की थाली में रोली, चावल, फूल, धागा, फल और मिठाई रखी जाती है। फिर वे वट यानी बरगद के पेड़ के पास जाती हैं। बरगद का पेड़ इस पर्व का केंद्र है। उसकी गहरी जड़ें और फैली शाखाएँ एक मजबूत, लंबे समय तक टिके रहने वाले रिश्ते का प्रतीक मानी जाती हैं। जैसे वह पेड़ वर्षों तक खड़ा रहता है, वैसे ही वैवाहिक जीवन भी स्थिर और अडिग रहे यही कामना की जाती है।
वट वृक्ष के चारों ओर धागा लपेटते हुए महिलाएँ सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती हैं। कई जगहों पर कोई एक महिला कहानी सुनाती है और बाकी श्रद्धा से सुनती हैं।
सावित्री की कहानी बहुत पुरानी है, लेकिन हर बार सुनने पर नई लगती है। उसने यह जानते हुए भी सत्यवान से विवाह किया कि उसकी आयु कम है। जब यमराज स्वयं उसके पति का प्राण लेने आए, तो सावित्री ने हार नहीं मानी। उसने धैर्य, बुद्धिमत्ता और अटूट प्रेम से यमराज को प्रभावित किया और अंततः अपने पति का जीवन वापस पाया।
यह कहानी केवल चमत्कार की नहीं है। यह भावनात्मक शक्ति की कहानी है। यह बताती है कि सच्चा प्रेम केवल खुशी के पलों में साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि कठिन समय में अडिग खड़े रहने का साहस भी है।
कई महिलाएँ इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं। कुछ फलाहार करती हैं। लेकिन व्रत का असली अर्थ भूखे रहना नहीं, बल्कि संयम रखना है। दिनभर वे घर के काम भी करती हैं और पूजा की तैयारी भी। फिर भी चेहरे पर थकान से ज्यादा संतोष दिखता है। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है।
जब चाँद आसमान में चमकता है, तो लगता है जैसे पूरे दिन की तपस्या को एक शांत आशीर्वाद मिल गया हो।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर दान का भी विशेष महत्व है। कई महिलाएँ जरूरतमंदों को अनाज, कपड़े या फल देती हैं। कुछ परिवारों में ब्राह्मण भोजन की परंपरा है।
यह पर्व सिखाता है कि खुशहाली केवल अपने घर तक सीमित न रहे। जब हम दूसरों के लिए कुछ करते हैं, तो उसका आशीर्वाद भी हमारे जीवन में लौटता है।
आज के शहरों में हर जगह बरगद का पेड़ मिलना आसान नहीं। फिर भी महिलाएँ मंदिरों में या पार्कों में जाकर पूजा करती हैं। कहीं-कहीं प्रतीकात्मक रूप से पौधे की पूजा भी की जाती है।
कई कामकाजी महिलाएँ ऑफिस जाने से पहले सुबह ही पूजा कर लेती हैं। कुछ शाम को समय निकालती हैं।
सोशल मीडिया पर भी इस दिन की झलक देखने को मिलती है। पारंपरिक साड़ी में तस्वीरें, हाथों में पूजा की थाली, और साथ में छोटा सा संदेश सुखी दांपत्य जीवन की कामना। परंपरा का रूप बदल सकता है, लेकिन उसका भाव नहीं बदलता।
वट पूर्णिमा हमें एक बात बहुत सहज ढंग से याद दिलाती है रिश्ते अपने आप मजबूत नहीं रहते। उन्हें समय, समझ और धैर्य चाहिए।
आज की तेज़ जिंदगी में अक्सर हम छोटी-छोटी बातों पर उलझ जाते हैं। संवाद कम हो जाता है। ऐसे में यह पर्व हमें रुककर सोचने का मौका देता है। क्या हम अपने साथी की बात ध्यान से सुनते हैं? क्या हम कठिन समय में एक-दूसरे का सहारा बनते हैं?
सावित्री की कथा हमें सिखाती है कि भावनात्मक मजबूती किसी भी रिश्ते की असली ताकत होती है।
रात को जब चाँद पूरा और उजला दिखाई देता है, तो मन भी किसी तरह हल्का हो जाता है। पूर्णिमा का प्रकाश जैसे यह कहता है कि अंधेरा चाहे जितना हो, उजाला लौटकर आता है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा या वट पूर्णिमा 2026 केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह विश्वास का दिन है। यह अपने रिश्ते को फिर से महसूस करने का दिन है।
बरगद की जड़ों की तरह गहरे बनें रिश्ते। सावित्री की तरह अडिग हो विश्वास। और पूर्णिमा के चाँद की तरह शांत और उजला हो जीवन। शायद यही इस पर्व का सबसे सुंदर संदेश है सच्चा प्रेम धैर्य, निष्ठा और भीतर की शक्ति से ही टिकता है।