कुछ त्योहार ऐसे होते हैं जिनमें सिर्फ पूजा नहीं होती, भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। वट सावित्री पूर्णिमा भी उन्हीं पर्वों में से एक मानी जाती है। साल 2026 में यह व्रत 29 जून, सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन शादीशुदा महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।
सुबह-सुबह जब महिलाएं पूजा की थाली लेकर घर से निकलती हैं, तो माहौल अपने आप थोड़ा अलग लगने लगता है। कहीं हाथों में पूजा का धागा होता है, कहीं धीमे-धीमे कथा चल रही होती है, तो कहीं पेड़ के नीचे बैठकर महिलाएं पूजा कर रही होती हैं।
सच कहें तो वट सावित्री का दिन सिर्फ एक धार्मिक परंपरा जैसा नहीं लगता। इसमें रिश्तों का अपनापन भी महसूस होता है।
इस व्रत के पीछे सावित्री और सत्यवान की कथा सबसे ज्यादा सुनाई जाती है। कहते हैं सावित्री अपने पति सत्यवान से बहुत प्रेम करती थीं। जब उन्हें पता चला कि सत्यवान की आयु बहुत कम है, तब भी उन्होंने डरने के बजाय धैर्य रखा।
कथा के अनुसार जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी बुद्धि, प्रेम और दृढ़ विश्वास से आखिरकार उन्होंने अपने पति को वापस पा लिया।
अब लोग इस कहानी को अपने-अपने विश्वास से देखते हैं, लेकिन एक बात साफ महसूस होती है यह कथा रिश्ते में भरोसे और साथ निभाने की बात करती है।
वट यानी बरगद का पेड़ इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। बरगद को लंबी उम्र और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से महिलाएं पेड़ के चारों ओर धागा बांधकर पूजा करती हैं। लेकिन अगर ध्यान से देखें, तो यह सिर्फ एक रस्म नहीं लगती। इसमें अपने परिवार के लिए दुआ करने का भाव दिखाई देता है।
गांवों में आज भी वट सावित्री के दिन पेड़ के आसपास महिलाओं की भीड़ दिखाई देती है। कुछ महिलाएं हंसते हुए कथा सुनती हैं, कुछ चुपचाप पूजा करती हैं। वह पूरा दृश्य बहुत साधारण होते हुए भी मन को छू जाता है।
वट सावित्री वाले दिन कई घरों में सुबह से ही पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है। कोई पूजा की थाली सजा रहा होता है, कोई फल रख रहा होता है, तो कहीं महिलाएं पारंपरिक कपड़े पहनकर तैयार हो रही होती हैं।
पहले के समय में यह सब पूरे परिवार के साथ होता था। आज शहरों में जिंदगी थोड़ी बदल गई है, लेकिन फिर भी कई घरों में यह परंपरा अब तक वैसे ही निभाई जाती है। और सच कहें तो ऐसे त्योहार परिवार को थोड़ा करीब ले आते हैं।
बहुत लोग सोचते हैं कि व्रत का मतलब केवल खाना छोड़ देना है। लेकिन वट सावित्री में भावना ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। महिलाएं पूरे मन से परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। कुछ निर्जला व्रत रखती हैं, तो कुछ फलाहार लेकर पूजा करती हैं।
लेकिन असली बात शायद उस प्रेम और समर्पण में होती है, जिसके साथ यह व्रत किया जाता है।
आज की जिंदगी में लोग बहुत व्यस्त हो गए हैं। काम, तनाव और जिम्मेदारियों के बीच रिश्तों के लिए समय कम होता जा रहा है। ऐसे में वट सावित्री जैसा पर्व लोगों को रिश्तों की अहमियत याद दिलाता है।
यह सिर्फ पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला व्रत नहीं लगता, बल्कि साथ निभाने और परिवार के लिए मन से दुआ करने का दिन भी महसूस होता है। शायद इसी वजह से इतने सालों बाद भी यह परंपरा आज तक लोगों के दिलों से जुड़ी हुई है।
कई बार लोग सोचते हैं कि पुरानी कहानियां सिर्फ धार्मिक बातें हैं। लेकिन अगर ध्यान से समझें, तो उनमें जिंदगी की सच्चाई भी छिपी होती है। सावित्री और सत्यवान की कथा भी यही सिखाती है कि मुश्किल समय में धैर्य और साथ बहुत जरूरी होता है।
आज रिश्ते जल्दी टूटने लगे हैं, लोग छोटी बातों पर दूर हो जाते हैं। ऐसे समय में यह कहानी रिश्तों में विश्वास बनाए रखने की बात करती है।
वट सावित्री पूर्णिमा केवल एक व्रत नहीं है। यह प्रेम, विश्वास और परिवार के साथ जुड़े रहने की भावना का पर्व लगता है। 29 जून 2026 को मनाया जाने वाला यह दिन कई महिलाओं के लिए श्रद्धा और भावनाओं से भरा रहेगा।
बरगद के पेड़ के नीचे की पूजा, सावित्री-सत्यवान की कथा और परिवार के लिए की गई प्रार्थना यही चीजें इस पर्व को इतना खास बनाती हैं।