जब फाल्गुन की पूर्णिमा पास आती है, तो केवल रंगों की तैयारी नहीं होती पुराणों की कथाएँ भी जीवंत होने लगती हैं। होली का हर अनुष्ठान, हर अग्नि और हर रंग किसी न किसी दिव्य प्रसंग से जुड़ा है। यह पर्व हमें केवल उत्सव मनाना नहीं सिखाता, बल्कि उन घटनाओं को याद दिलाता है जिन्होंने धर्म, संयम और प्रेम को नई परिभाषा दी। प्रह्लाद की अडिग भक्ति, कामदेव का दहन और ब्रज में राधा-कृष्ण की प्रेममयी लीला ये तीनों कथाएँ मिलकर होली को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करती हैं।
होली की सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध कथा भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है। असुर राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को सर्वशक्तिमान मानता था और चाहता था कि पूरा राज्य उसी की पूजा करे। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। अनेक यातनाओं के बाद भी जब प्रह्लाद ने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी, तब राजा ने अंतिम उपाय के रूप में अपनी बहन होलिका को बुलाया।
होलिका को वरदान था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी। योजना बनाई गई कि वह अग्नि में बैठकर प्रह्लाद को गोद में ले ले, जिससे बालक जल जाए। परंतु ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहा और होलिका स्वयं अग्नि में भस्म हो गई।
यह घटना आज होलिका दहन के रूप में मनाई जाती है। इसका संदेश स्पष्ट है सच्ची श्रद्धा को कोई अग्नि नहीं जला सकती, जबकि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।
दक्षिण भारत में होली को “काम दहनम्” से भी जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार, जब भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे, तब देवताओं ने कामदेव से निवेदन किया कि वे शिव का ध्यान भंग करें। उद्देश्य था शिव और पार्वती का विवाह, जिससे संसार में संतुलन बना रहे।
कामदेव ने पुष्पबाण चलाया और शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया। इससे शिव क्रोधित हुए और अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में रति के करुण विलाप पर शिव ने कामदेव को सूक्ष्म रूप में पुनर्जीवित किया।
यह कथा हमें सिखाती है कि अनियंत्रित इच्छाएँ विनाश का कारण बन सकती हैं। होली की अग्नि केवल होलिका के दहन का प्रतीक नहीं, बल्कि यह काम और अहंकार जैसे आंतरिक विकारों को जलाने का भी संदेश देती है।
यदि होली को आनंद और प्रेम के उत्सव के रूप में देखना हो, तो ब्रज भूमि की ओर देखना चाहिए। वृंदावन और बरसाना में भगवान श्रीकृष्ण और राधा की होली की लीलाएँ आज भी जीवित हैं।
कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रंग और गुलाल खेलते थे। राधा और कृष्ण की यह चंचल लीला प्रेम, समानता और हर्ष का प्रतीक बन गई। आज भी बरसाना की लट्ठमार होली और वृंदावन की फूलों की होली उसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
वृंदावन स्थित Gopinath Temple सहित अनेक मंदिरों में होली के अवसर पर भजन-कीर्तन और रंगोत्सव का आयोजन होता है। यहाँ रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि हृदय में लगते हैं।
राधा-कृष्ण की होली यह संदेश देती है कि प्रेम में कोई भेदभाव नहीं होता। रंगों की तरह ही जीवन भी विविधता से सुंदर बनता है।
होली से जुड़ी ये पौराणिक कथाएँ केवल अतीत की घटनाएँ नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन हैं।
जब होलिका की अग्नि जलती है, तो वह हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है। और जब रंग उड़ते हैं, तो वे हमें याद दिलाते हैं कि जीवन में प्रेम और उल्लास का स्थान सर्वोपरि है।अंततः होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, संयम और प्रेम की शाश्वत गाथा है।