महाशिवरात्रि का पर्व पूरे भारत और नेपाल में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है, परंतु इसकी परंपराएँ, अनुष्ठान और उत्सव की शैली हर क्षेत्र में अलग–अलग रंगों में दिखाई देती है। यही विविधता इस पर्व को और भी समृद्ध और व्यापक बनाती है। भगवान शिव स्वयं सार्वभौमिक हैं वे पर्वतों के देव भी हैं, श्मशान के योगी भी और गृहस्थों के आराध्य भी। इसलिए महाशिवरात्रि का उत्सव भी क्षेत्र के अनुसार अलग स्वरूप धारण कर लेता है। आइए जानें उत्तर भारत, दक्षिण भारत और नेपाल में इस पावन पर्व की विशेष झलकियाँ।
उत्तर भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और हिमालयी क्षेत्रों में महाशिवरात्रि अत्यंत उत्साह के साथ मनाई जाती है। यहाँ इस पर्व की सबसे प्रमुख विशेषता है रात्रि जागरण और भजन–कीर्तन। मंदिरों में पूरी रात ॐ नमः शिवाय का जप, शिव भजन और कथा का आयोजन होता है। श्रद्धालु पूरी रात जागकर शिव का स्मरण करते हैं, जिसे आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है।
कई स्थानों पर कांवड़–शैली की जल अर्पण परंपरा भी देखने को मिलती है। भक्त पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। यद्यपि कांवड़ यात्रा सावन में अधिक प्रसिद्ध है, फिर भी महाशिवरात्रि पर भी जलाभिषेक का विशेष महत्व रहता है।
इसके अतिरिक्त, अनेक स्थानों पर सामुदायिक भंडारे आयोजित किए जाते हैं। मंदिरों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा प्रसाद और भोजन वितरण किया जाता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। लोग जाति–भेद से ऊपर उठकर एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जो शिव के समभाव का संदेश देता है।
दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में महाशिवरात्रि अत्यंत विधिपूर्वक और वैदिक रीति से मनाई जाती है। यहाँ मंदिरों में विशेष अभिषेकम का आयोजन होता है। शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। वैदिक मंत्रों के साथ यह अनुष्ठान अत्यंत भव्य और अनुशासित वातावरण में सम्पन्न होता है।
दक्षिण भारत में अलंकारम की विशेष परंपरा है। शिवलिंग को फूलों, चंदन और विभिन्न अलंकारों से सजाया जाता है। कई मंदिरों में अलग–अलग पहरों में अलग–अलग रूपों में शिव का श्रृंगार किया जाता है, जिसे देखने के लिए भक्त बड़ी संख्या में उपस्थित होते हैं।
इसके साथ ही मंदिर परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। भरतनाट्यम, शास्त्रीय संगीत, भक्ति नृत्य और शिव–स्तुति पर आधारित प्रस्तुतियाँ भक्तों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती हैं। यहाँ भक्ति और संस्कृति का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
नेपाल में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है, विशेषकर काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में। यह विश्व के प्रमुख शिवधामों में से एक है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं, जिनमें भारत और अन्य देशों से आए भक्त भी शामिल होते हैं।
इस दिन पशुपतिनाथ परिसर में साधु–संतों और अघोरियों की विशेष उपस्थिति रहती है। विभिन्न अखाड़ों के साधु अपने विशिष्ट स्वरूप और साधना के साथ यहाँ आते हैं। यह दृश्य आध्यात्मिक विविधता और तपस्या का प्रतीक माना जाता है।
नेपाल में इस पर्व का वातावरण अत्यंत उत्सवपूर्ण होता है। मंदिर के आसपास दीपों की सजावट, भजन, मंत्रोच्चार और अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं की भीड़ इसे वैश्विक आध्यात्मिक आयोजन का रूप दे देती है।
महाशिवरात्रि के व्रत के नियम भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग–अलग होते हैं। उत्तर भारत में फलाहार के रूप में साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, आलू और मूंगफली का उपयोग अधिक किया जाता है। साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू की पूरी और सिंघाड़े के पकवान लोकप्रिय हैं।
महाराष्ट्र और गुजरात में भी साबूदाना और मूंगफली आधारित व्यंजन प्रचलित हैं, जबकि दक्षिण भारत में कई स्थानों पर केवल फल, नारियल पानी या हल्का सात्विक आहार लिया जाता है। कुछ लोग पूर्ण उपवास रखते हैं, तो कुछ केवल एक समय भोजन करते हैं। नेपाल में भी फलाहार और दूध का विशेष महत्व है।
इन भिन्नताओं के बावजूद एक बात समान है व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करना है।
महाशिवरात्रि की क्षेत्रीय विविधताएँ यह दर्शाती हैं कि शिव–भक्ति किसी एक रीति या परंपरा तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत का जागरण, दक्षिण भारत का वैदिक अभिषेक, नेपाल का पशुपतिनाथ उत्सव सब अपने–अपने ढंग से उसी शिव–तत्त्व की उपासना हैं।
विविध परंपराओं के बावजूद मूल भावना एक ही है भक्ति, संयम और आत्म–जागरण। यही महाशिवरात्रि का वास्तविक संदेश है: भले ही हमारी विधियाँ अलग हों, पर हमारी श्रद्धा और लक्ष्य एक ही है शिव से जुड़ना और भीतर के अंधकार को प्रकाश में बदलना।