इस पावन रात में ज्योतिर्लिंगों का वातावरण कुछ अलग ही हो जाता है जैसे भक्ति स्वयं जीवंत हो उठी हो। मंदिरों में उमड़ती श्रद्धा, घंटों की गूंज, बेलपत्र और गंगाजल से होता अभिषेक हर दृश्य मन को छू जाता है।
हर ज्योतिर्लिंग अपनी खास परंपराओं के साथ इस रात को मनाता है कहीं भव्य रुद्राभिषेक, कहीं अलौकिक श्रृंगार, तो कहीं पूरी रात चलता भजन और ध्यान। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि शिव से जुड़ने का गहरा और भावनात्मक अनुभव बन जाता है।
महाशिवरात्रि पर लगभग सभी ज्योतिर्लिंगों में रात–भर लंबी कतारें लगती हैं। श्रद्धालु उपवास रखकर पूरी रात जागरण करते हुए दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा विशेष दर्शन व्यवस्था की जाती है ताकि अधिक से अधिक भक्त भगवान शिव के दर्शन कर सकें।
इस दिन अनेक बार विशेष अभिषेक किए जाते हैं, जल, दूध, दही, घी, शहद और बेलपत्र से रुद्राभिषेक होता है। कई स्थानों पर भक्त स्वयं भी अभिषेक करने का अवसर प्राप्त करते हैं।
पूरी रात मंदिरों में भजन–कीर्तन, शिव स्तुति, रुद्राष्टाध्यायी पाठ और रुद्राभिषेक होते हैं। विशेष आरतियाँ चारों प्रहर में की जाती हैं। वातावरण मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि से गूंजता रहता है।
मंदिरों को रंग–बिरंगे फूलों, रोशनी और दीपों से सजाया जाता है। लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति के कारण प्रशासन विशेष सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था करता है। कई स्थानों पर मेले जैसे दृश्य दिखाई देते हैं, जहाँ भक्ति और उत्सव का अद्भुत संगम होता है।
अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर महाशिवरात्रि पर विशेष रूप से आकर्षक दिखाई देता है। समुद्र की लहरों के साथ जब मंदिर रोशनी और फूलों से सजता है, तो दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। यहाँ भव्य महा आरती और विशेष रुद्राभिषेक आयोजित किए जाते हैं। हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और समुद्र तट पर हर हर महादेव की गूंज वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग महाशिवरात्रि पर अद्वितीय ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। यहाँ का निशीथ काल विशेष रूप से प्रभावशाली माना जाता है। सबसे प्रसिद्ध है यहाँ की भस्म आरती, जो महाशिवरात्रि पर और भी विशेष हो जाती है। उज्जैन शहर में विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है और क्षिप्रा नदी के तट पर भव्य मेला लगता है। पूरा शहर शिवमय हो जाता है।
केदारनाथ हिमालय की ऊँचाइयों पर स्थित है और अत्यंत पवित्र माना जाता है। हालांकि, सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण यह मंदिर प्रायः बंद रहता है।
महाशिवरात्रि के समय यदि मंदिर बंद हो, तो पूजा और विशेष अनुष्ठान शीतकालीन गद्दीस्थल में संपन्न होते हैं। केदारनाथ का आध्यात्मिक महत्व इतना गहरा है कि यहाँ की पूजा साधारण अनुष्ठान से अधिक ध्यान और तपस्या का प्रतीक मानी जाती है।
दक्षिण भारत का यह पर्वतीय ज्योतिर्लिंग महाशिवरात्रि पर भव्य दीपोत्सव और विशाल उत्सव का केंद्र बन जाता है। मंदिर परिसर और पहाड़ी क्षेत्र को हजारों दीपों और रोशनी से सजाया जाता है। यहाँ विशेष कल्याणोत्सव और रात्रि जागरण का आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त भाग लेते हैं।
नर्मदा नदी के मध्य स्थित ओंकारेश्वर द्वीप पर महाशिवरात्रि अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। यहाँ निरंतर रुद्राभिषेक और भजन–कीर्तन चलते रहते हैं।
नदी तट पर विशेष पूजा और दीपदान का आयोजन होता है। पूरा द्वीप शिव–भक्ति से आलोकित हो उठता है।
महाराष्ट्र के इन दोनों ज्योतिर्लिंगों में महाशिवरात्रि पर विशेष अभिषेक और पारंपरिक कीर्तन की परंपरा देखी जाती है। भीमाशंकर के पहाड़ी वातावरण में रात्रि जागरण अत्यंत आध्यात्मिक अनुभव देता है, जबकि त्र्यंबकेश्वर में वैदिक मंत्रोच्चार और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है। स्थानीय भक्त मंडलियाँ पारंपरिक कीर्तन से वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं।
समुद्र तट के समीप स्थित नागेश्वर मंदिर महाशिवरात्रि पर विशेष रूप से सजाया जाता है। यहाँ विशाल शिव प्रतिमा और मंदिर परिसर को रोशनी और फूलों से सुसज्जित किया जाता है। विशेष दर्शन और अभिषेक के साथ यहाँ भी श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं।
रामेश्वरम का यह ज्योतिर्लिंग अपने लंबे गलियारों और भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। महाशिवरात्रि पर यहाँ पवित्र स्नान और विशेष अनुष्ठानों का आयोजन होता है। भक्त 22 पवित्र कुंडों में स्नान कर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। रात्रि में विस्तृत पूजा और दीप सज्जा मंदिर को अलौकिक रूप प्रदान करती है।
महाशिवरात्रि पर ज्योतिर्लिंगों में होने वाला उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिक भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत अनुभव है। हर ज्योतिर्लिंग का अपना अलग वातावरण, परंपरा और विशेषता है परंतु सभी में एक ही भावना समान है। शिव के प्रति पूर्ण समर्पण।
यदि जीवन में कभी अवसर मिले, तो महाशिवरात्रि के दिन किसी ज्योतिर्लिंग में उपस्थित होकर उस दिव्य रात्रि का अनुभव अवश्य करें। क्योंकि उस क्षण आप केवल दर्शन नहीं करते आप शिव–तत्त्व की जीवंत अनुभूति करते हैं।