महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, समाज और मानवता के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी जागृत करने का अवसर है। भगवान शिव को प्रकृति के देव कहा जाता है। वे कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं, गंगा को अपनी जटाओं में धारण करते हैं और समस्त जीव–जंतुओं के प्रति करुणा का भाव रखते हैं। ऐसे में यदि हम शिव–भक्ति करते हुए पर्यावरण की उपेक्षा करें या समाज के प्रति उदासीन रहें, तो हमारी पूजा अधूरी रह जाती है। इसलिए आवश्यक है कि महाशिवरात्रि को श्रद्धा के साथ–साथ जागरूकता और सेवा भाव से भी मनाया जाए।
आज के समय में त्योहारों के दौरान प्लास्टिक और रासायनिक सामग्री का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बन चुका है। महाशिवरात्रि पर मंदिरों और घरों में सजावट के लिए अक्सर प्लास्टिक के फूल, चमकीली सजावटी सामग्री और कृत्रिम मालाएँ प्रयोग की जाती हैं। ये वस्तुएँ न तो जल्दी नष्ट होती हैं और न ही प्रकृति के अनुकूल होती हैं। इससे मिट्टी और जल दोनों प्रदूषित होते हैं।
इसके स्थान पर प्राकृतिक फूल, बेलपत्र, मिट्टी के दीपक और कपड़े की सजावट का उपयोग करना अधिक उचित है। पारंपरिक और प्राकृतिक सामग्री न केवल धार्मिक दृष्टि से शुद्ध मानी जाती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक होती है। शिव–भक्ति का अर्थ है प्रकृति के प्रति सम्मान, इसलिए हमें सजावट और पूजा सामग्री का चयन सोच–समझकर करना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। कई स्थानों पर पूजा सामग्री या दूध सीधे नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है, जिससे जल प्रदूषण बढ़ता है। हमें यह समझना होगा कि गंगा और अन्य नदियाँ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं।
अभिषेक के बाद सामग्री को सीधे नदी में न बहाकर उचित स्थान पर विसर्जित करें। यदि संभव हो, तो अभिषेक का जल पौधों में अर्पित करें। दूध या अन्य खाद्य पदार्थों को व्यर्थ बहाने के बजाय जरूरतमंदों में वितरित करना अधिक पुण्यदायी और मानवीय है। जल संरक्षण और स्वच्छता भी शिव–पूजा का ही एक रूप है।
महाशिवरात्रि पर मंदिरों में भारी भीड़ उमड़ती है। ऐसे समय में अनुशासन और धैर्य बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। धक्का–मुक्की, अव्यवस्था या जल्दबाजी से दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। श्रद्धालुओं को पंक्ति में शांतिपूर्वक खड़े रहकर दर्शन करना चाहिए और प्रशासन या स्वयंसेवकों के निर्देशों का पालन करना चाहिए। यह भी एक प्रकार की सामाजिक जिम्मेदारी है।
भक्ति का अर्थ अत्यधिक शोर नहीं है। कई स्थानों पर लाउडस्पीकर का अत्यधिक उपयोग आसपास के लोगों, विद्यार्थियों और अस्पतालों के लिए असुविधा उत्पन्न करता है। शिव ध्यान और मौन के प्रतीक हैं, इसलिए भजन–कीर्तन मध्यम ध्वनि में भी उतने ही प्रभावशाली होते हैं। संतुलित ध्वनि स्तर बनाए रखना समाज के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक है।
त्योहारों के बाद मंदिर परिसर और आसपास कचरा फैल जाना एक आम समस्या है। प्लास्टिक की बोतलें, पैकेट और फूल–मालाएँ इधर–उधर फेंक दी जाती हैं। यह न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि धार्मिक स्थल की पवित्रता भी प्रभावित करता है। प्रत्येक भक्त का कर्तव्य है कि वह कचरा निर्धारित स्थान पर डाले और यदि संभव हो तो सफाई अभियान में सहयोग करे। स्वच्छता को सेवा का रूप मानकर अपनाना चाहिए।
महाशिवरात्रि का एक महत्वपूर्ण पक्ष सेवा और दान भी है। शास्त्रों में अन्नदान को श्रेष्ठ दान कहा गया है। इस दिन गरीबों, जरूरतमंदों और यात्रियों को भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। व्रत रखने के साथ यदि हम किसी भूखे को भोजन कराते हैं, तो हमारी भक्ति और भी सार्थक हो जाती है।
कपड़े, कंबल या आवश्यक वस्तुएँ जरूरतमंदों को देना भी एक श्रेष्ठ कार्य है। समाज में कई लोग ऐसे हैं जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। महाशिवरात्रि जैसे पावन अवसर पर उनकी सहायता करना शिव की करुणा को अपने जीवन में उतारने जैसा है।
मंदिरों और यात्राओं में स्वयंसेवक के रूप में सेवा देना भी अत्यंत पुण्यदायी है। जल वितरण, भीड़ प्रबंधन में सहायता, प्रसाद वितरण या सफाई कार्य में योगदान देकर हम समाज के लिए सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं। यह निस्वार्थ सेवा शिव–भक्ति का सच्चा स्वरूप है।
महाशिवरात्रि हमें यह सिखाती है कि पूजा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। जब हम प्रकृति की रक्षा करते हैं, समाज में अनुशासन बनाए रखते हैं और जरूरतमंदों की सेवा करते हैं, तभी हमारी भक्ति पूर्ण होती है। भगवान शिव संतुलन, करुणा और सरलता के प्रतीक हैं। इस महाशिवरात्रि संकल्प लें कि हम पर्यावरण की रक्षा करेंगे, स्वच्छता का ध्यान रखेंगे और समाज में सेवा भाव को बढ़ावा देंगे।भक्ति, जिम्मेदारी और सेवा यही महाशिवरात्रि का सच्चा संदेश है।