सनातन धर्म में किसी भी पर्व की केवल तिथि ही नहीं, बल्कि उसका क्षण (मुहूर्त) भी विशेष महत्व रखता है। मकर संक्रान्ति उस सटीक क्षण को कहा जाता है जब सूर्य धनु राशि को त्याग कर मकर राशि में प्रवेश करता है। यही क्षण संक्रान्ति काल कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार, संक्रान्ति का पुण्य केवल पूरे दिन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस समय-खंड में विशेष रूप से सक्रिय होता है, जिसे पुण्यकाल कहा गया है।
धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में यह स्पष्ट किया गया है कि मकर संक्रान्ति का पुण्यकाल सूर्य के राशि परिवर्तन के आसपास केंद्रित रहता है। इसी कारण शास्त्र यह निर्देश देते हैं कि स्नान, दान और जप जैसे कर्म संक्रान्ति के पुण्यकाल में किए जाएँ तो उनका फल कई गुना बढ़ जाता है। यद्यपि सामान्य श्रद्धालु पूरे दिन धार्मिक कार्य करते हैं, फिर भी शास्त्रसम्मत दृष्टि से समय का यह ज्ञान पर्व को और अधिक सार्थक बनाता है।
मकर संक्रान्ति का मूल स्वरूप अनुष्ठान प्रधान माना गया है। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और धर्माचरण का अवसर है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस दिन प्रातःकाल स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देना विशेष पुण्यकारी है। सूर्योपासना को वेदों में प्रत्यक्ष ब्रह्म की आराधना कहा गया है, इसलिए मकर संक्रान्ति पर सूर्य को जल, तिल और पुष्प अर्पित करने की परंपरा विकसित हुई।
इसके अतिरिक्त, इस दिन जप, हवन, ब्राह्मण भोजन और दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, मकर संक्रान्ति पर किया गया दान अक्षय फल देता है, अर्थात उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। यही कारण है कि तिल, अन्न, वस्त्र और पात्र दान को इस दिन अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्य को त्याग, कृतज्ञता और करुणा के मार्ग पर आगे बढ़ाना है।
मकर संक्रान्ति की परंपराएँ भारत के हर क्षेत्र में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे का भाव एक ही है—समरसता और शुभकामना। तिल और गुड़ का आदान-प्रदान केवल खान-पान की परंपरा नहीं है, बल्कि यह समाज में मधुरता और सौहार्द बनाए रखने का प्रतीक है। शास्त्रों में तिल को पाप-नाशक और गुड़ को शुभता व मधुरता का प्रतीक माना गया है।
इसी दिन पतंग उड़ाने, लोकगीत गाने और सामूहिक उत्सव मनाने की परंपरा भी प्रचलित है। इन परंपराओं का उद्देश्य मनुष्य को प्रकृति से जोड़ना और शीत ऋतु के अंत की घोषणा करना है। मकर संक्रान्ति इस बात का स्मरण कराती है कि पर्व केवल मंदिरों तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज और परिवार के बीच धर्म को जीवंत बनाए रखने का माध्यम भी होते हैं।
मकर संक्रान्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष तीर्थ दर्शन और धार्मिक मेले हैं। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा, यमुना, गोदावरी और सरस्वती जैसे तीर्थों पर इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। विशेष रूप से प्रयागराज, हरिद्वार और गंगासागर जैसे क्षेत्रों में मकर संक्रान्ति के दिन विशाल धार्मिक मेले आयोजित होते हैं।
इन मेलों का उद्देश्य केवल स्नान या दर्शन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सनातन संस्कृति के जीवंत स्वरूप को दर्शाते हैं। साधु-संतों का संग, धर्मोपदेश, कथा और भजन—ये सभी मकर संक्रान्ति के आध्यात्मिक वातावरण को और गहन बनाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, तीर्थ, संत और सत्कर्म—इन तीनों का संग एक साथ मिल जाए, तो वह समय अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक होता है, और मकर संक्रान्ति यही अवसर प्रदान करती है।