मकर संक्रान्ति क्या है? – शास्त्र, ज्योतिष और सनातन परंपरा के अनुसार पूर्ण विवरण

मकर संक्रान्ति (Makar Sankranti) सनातन धर्म का ऐसा पर्व है, जो केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि काल, प्रकृति और जीवन-दर्शन का गहरा संकेत देता है। यह वह दिन है जब सूर्य अपनी गति में एक विशेष परिवर्तन करता है और धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी खगोलीय परिवर्तन को शास्त्रीय भाषा में संक्रान्ति कहा गया है। सामान्यतः एक वर्ष में बारह संक्रान्तियाँ होती हैं, लेकिन मकर संक्रान्ति को इन सभी में सबसे अधिक महत्व दिया गया है, क्योंकि इसी दिन से सूर्य का उत्तरायण काल प्रारंभ माना जाता है। हिंदू धर्म में सूर्य को केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देवता माना गया है। ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों तक सूर्य को जीवन का आधार, ऊर्जा का स्रोत और चेतना का प्रतीक कहा गया है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब यह परिवर्तन केवल आकाशीय घटना नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव मानव जीवन, प्रकृति और आध्यात्मिक साधना पर भी पड़ता है। इसी कारण मकर संक्रान्ति को शास्त्रों में महापुण्य काल कहा गया है। सनातन परंपरा में समय को दो भागों में बाँटा गया है—उत्तरायण और दक्षिणायन। मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरायण होता है, अर्थात सूर्य की गति उत्तर दिशा की ओर मानी जाती है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को पितरों की रात्रि कहा गया है। भगवद्गीता और उपनिषदों में यह संकेत मिलता है कि उत्तरायण काल में किया गया जप, तप, दान और साधना विशेष फलदायी होती है। यही कारण है कि मकर संक्रान्ति को मोक्ष-साधना से भी जोड़ा गया है। धर्मग्रंथों में मकर संक्रान्ति का उल्लेख केवल पर्व के रूप में नहीं, बल्कि धर्म और कर्म के संतुलन के प्रतीक के रूप में मिलता है। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि जैसे सूर्य अपनी दिशा बदलता है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने जीवन में अधर्म, आलस्य और नकारात्मकता से हटकर धर्म, संयम और सद्कर्म की ओर बढ़ना चाहिए। शास्त्रों में इसे आत्मपरिवर्तन का पर्व कहा गया है। मकर संक्रान्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह पर्व चंद्र पंचांग पर आधारित नहीं है, बल्कि सौर गणना पर आधारित है। अधिकतर हिंदू पर्व तिथि के अनुसार बदलते रहते हैं, लेकिन मकर संक्रान्ति लगभग हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को ही आती है। यही कारण है कि इसे भारतीय परंपरा में सौर नववर्ष की चेतना से भी जोड़ा जाता है। यह पर्व हमें सूर्य और पृथ्वी के वैज्ञानिक संबंध की भी याद दिलाता है, जो भारतीय ऋषियों की गहन खगोलीय समझ को दर्शाता है। शास्त्रों में यह भी वर्णन मिलता है कि मकर संक्रान्ति के दिन पवित्र नदियों में स्नान, विशेष रूप से गंगा स्नान, करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में इस दिन किए गए स्नान और दान को अक्षय फल देने वाला बताया गया है। इसी कारण देश के विभिन्न तीर्थ क्षेत्रों में मकर संक्रान्ति के अवसर पर विशाल धार्मिक आयोजन और मेले लगते हैं। मकर संक्रान्ति केवल व्यक्तिगत साधना का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता का भी प्रतीक है। तिल-गुड़ का आदान-प्रदान, दान-पुण्य और सामूहिक उत्सव इस बात का संकेत देते हैं कि यह पर्व मनुष्य को स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और प्रकृति के साथ संतुलन बनाना सिखाता है। शास्त्रों में दान को धर्म का मूल बताया गया है और मकर संक्रान्ति इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का अवसर प्रदान करती है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति को केवल एक दिन का त्योहार समझना इसकी गरिमा को कम करना होगा। यह पर्व वास्तव में सूर्य-उपासना, काल-चक्र की समझ, आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व—इन सभी का समन्वय है। यही कारण है कि सनातन धर्म में मकर संक्रान्ति को युगों से विशेष सम्मान और श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहा है।

संक्रान्ति दिनाँक और समय का शास्त्रीय महत्व

सनातन धर्म में किसी भी पर्व की केवल तिथि ही नहीं, बल्कि उसका क्षण (मुहूर्त) भी विशेष महत्व रखता है। मकर संक्रान्ति उस सटीक क्षण को कहा जाता है जब सूर्य धनु राशि को त्याग कर मकर राशि में प्रवेश करता है। यही क्षण संक्रान्ति काल कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार, संक्रान्ति का पुण्य केवल पूरे दिन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस समय-खंड में विशेष रूप से सक्रिय होता है, जिसे पुण्यकाल कहा गया है।

धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में यह स्पष्ट किया गया है कि मकर संक्रान्ति का पुण्यकाल सूर्य के राशि परिवर्तन के आसपास केंद्रित रहता है। इसी कारण शास्त्र यह निर्देश देते हैं कि स्नान, दान और जप जैसे कर्म संक्रान्ति के पुण्यकाल में किए जाएँ तो उनका फल कई गुना बढ़ जाता है। यद्यपि सामान्य श्रद्धालु पूरे दिन धार्मिक कार्य करते हैं, फिर भी शास्त्रसम्मत दृष्टि से समय का यह ज्ञान पर्व को और अधिक सार्थक बनाता है।

संक्रान्ति पर अनुष्ठान और धार्मिक कर्म

मकर संक्रान्ति का मूल स्वरूप अनुष्ठान प्रधान माना गया है। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और धर्माचरण का अवसर है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस दिन प्रातःकाल स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देना विशेष पुण्यकारी है। सूर्योपासना को वेदों में प्रत्यक्ष ब्रह्म की आराधना कहा गया है, इसलिए मकर संक्रान्ति पर सूर्य को जल, तिल और पुष्प अर्पित करने की परंपरा विकसित हुई।

इसके अतिरिक्त, इस दिन जप, हवन, ब्राह्मण भोजन और दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, मकर संक्रान्ति पर किया गया दान अक्षय फल देता है, अर्थात उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। यही कारण है कि तिल, अन्न, वस्त्र और पात्र दान को इस दिन अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्य को त्याग, कृतज्ञता और करुणा के मार्ग पर आगे बढ़ाना है।

मकर संक्रान्ति पर परंपराएँ और सामाजिक भाव

मकर संक्रान्ति की परंपराएँ भारत के हर क्षेत्र में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे का भाव एक ही है—समरसता और शुभकामना। तिल और गुड़ का आदान-प्रदान केवल खान-पान की परंपरा नहीं है, बल्कि यह समाज में मधुरता और सौहार्द बनाए रखने का प्रतीक है। शास्त्रों में तिल को पाप-नाशक और गुड़ को शुभता व मधुरता का प्रतीक माना गया है।

इसी दिन पतंग उड़ाने, लोकगीत गाने और सामूहिक उत्सव मनाने की परंपरा भी प्रचलित है। इन परंपराओं का उद्देश्य मनुष्य को प्रकृति से जोड़ना और शीत ऋतु के अंत की घोषणा करना है। मकर संक्रान्ति इस बात का स्मरण कराती है कि पर्व केवल मंदिरों तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज और परिवार के बीच धर्म को जीवंत बनाए रखने का माध्यम भी होते हैं।

तीर्थ दर्शन और मकर संक्रान्ति के मेले

मकर संक्रान्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष तीर्थ दर्शन और धार्मिक मेले हैं। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा, यमुना, गोदावरी और सरस्वती जैसे तीर्थों पर इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। विशेष रूप से प्रयागराज, हरिद्वार और गंगासागर जैसे क्षेत्रों में मकर संक्रान्ति के दिन विशाल धार्मिक मेले आयोजित होते हैं।

इन मेलों का उद्देश्य केवल स्नान या दर्शन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सनातन संस्कृति के जीवंत स्वरूप को दर्शाते हैं। साधु-संतों का संग, धर्मोपदेश, कथा और भजन—ये सभी मकर संक्रान्ति के आध्यात्मिक वातावरण को और गहन बनाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, तीर्थ, संत और सत्कर्म—इन तीनों का संग एक साथ मिल जाए, तो वह समय अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक होता है, और मकर संक्रान्ति यही अवसर प्रदान करती है।

FAQs – मकर संक्रान्ति (Makar Sankranti)

Q1. मकर संक्रान्ति क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?
मकर संक्रान्ति वह पर्व है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण काल आरंभ होता है। शास्त्रों में इसे महापुण्य समय कहा गया है, क्योंकि इस अवधि में किए गए धार्मिक कर्म विशेष फल प्रदान करते हैं। यह पर्व धर्म, प्रकृति और समय के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तर दिशा की ओर गतिमान माना जाता है, जिसे उत्तरायण कहा गया है। उपनिषदों और गीता में उत्तरायण को देवयान मार्ग बताया गया है, जो आत्मा को उच्च आध्यात्मिक स्थिति की ओर ले जाता है।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का क्षय होता है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में मकर संक्रान्ति पर किए गए दान को अक्षय फल देने वाला बताया गया है।
तिल और गुड़ शीत ऋतु में शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। धार्मिक रूप से तिल को पाप-नाशक और गुड़ को मधुरता का प्रतीक माना गया है, इसलिए इनका आदान-प्रदान सामाजिक सौहार्द को बढ़ाता है।
मकर संक्रान्ति सौर पर्व है, इसलिए यह अधिकतर 14 या 15 जनवरी को ही मनाई जाती है। चंद्र आधारित पर्वों की तरह इसकी तिथि बार-बार नहीं बदलती।

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