27 मई 2026, बुधवार। सुबह की पहली किरण के साथ ही तमिलनाडु के कई शहरों में एक अलग सी हलचल महसूस हुई। मंदिरों की घंटियाँ सामान्य दिनों से थोड़ी पहले बज उठीं। हवा में चंदन और अगरबत्ती की खुशबू घुलने लगी। वजह थी वैकासी विसाकम वह पावन दिन जिसे भगवान मुरुगन, यानी कार्तिकेय, के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन केवल एक देवता नहीं, बल्कि विश्वास, साहस और ज्ञान का जीवंत प्रतीक माने जाते हैं। इस दिन को लेकर लोगों के दिल में एक अलग ही अपनापन होता है। कई परिवारों में तो यह त्योहार पीढ़ियों से विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब असुर तारकासुर का अत्याचार बढ़ गया था और देवता उससे परास्त हो रहे थे, तब एक दिव्य शक्ति के अवतरण की आवश्यकता हुई। कहा जाता है कि भगवान शिव के तेज से छह ज्योतियाँ प्रकट हुईं। इन ज्योतियों को कृत्तिका देवियों ने संभाला और बाद में माता पार्वती ने उन्हें एक रूप दिया। यही बालक आगे चलकर मुरुगन कहलाए।
युवावस्था में ही उन्होंने तारकासुर का वध किया और देवताओं को भय से मुक्त कराया। इसीलिए उन्हें केवल शिव-पुत्र नहीं, बल्कि दिव्य योद्धा के रूप में भी पूजा जाता है।
पर यह कथा केवल युद्ध की नहीं है। यह कहानी है साहस की। यह याद दिलाती है कि जब अंधकार बढ़ता है, तब प्रकाश भी जन्म लेता है।
तमिलनाडु के प्रसिद्ध तीर्थस्थल Palani Murugan Temple और Thiruchendur Murugan Temple में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं।
पलानी की पहाड़ी पर चढ़ते श्रद्धालुओं के चेहरों पर थकान कम और श्रद्धा अधिक दिखाई दे रही थी। कई लोग नंगे पांव सीढ़ियाँ चढ़ते दिखे। कुछ भक्त “कावड़ी” लेकर आए, जो तप और समर्पण का प्रतीक है।
तिरुचेंदूर में समुद्र की लहरों के बीच स्थित मंदिर का दृश्य अद्भुत था। लहरों की आवाज़ और मंत्रोच्चार साथ-साथ गूंज रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति भी इस उत्सव में शामिल हो।
वैकासी विसाकम पर भगवान मुरुगन को दूध, पंचामृत और चंदन से अभिषेक करना बेहद शुभ माना जाता है। सुबह से ही लोग दूध के कलश लेकर मंदिर पहुँचे।
दूध अर्पित करते समय कई भक्तों की आँखें नम थीं। वे चुपचाप मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे किसी ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए, किसी ने स्वास्थ्य के लिए, तो किसी ने जीवन की परेशानियों से मुक्ति के लिए।
एक बुज़ुर्ग श्रद्धालु ने मुस्कुराते हुए कहा, मैं पिछले तीस साल से इस दिन यहाँ आता हूँ। हर बार लगता है जैसे पहली बार आया हूँ। मन हल्का हो जाता है।
केवल बड़े मंदिर ही नहीं, घर-घर में भी पूजा हुई। कई परिवारों ने सुबह जल्दी उठकर घर साफ किया, भगवान मुरुगन की तस्वीर सजाई और फूल चढ़ाए। बच्चों को उनकी जन्मकथा सुनाई गई।
कई घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर आरती में शामिल हुए। त्योहार का यही तो असली रंग है साथ बैठना, साथ प्रार्थना करना, और साथ मुस्कुराना।
भगवान मुरुगन के हाथ में जो ‘वेल’ यानी भाला होता है, वह केवल हथियार नहीं माना जाता। वह ज्ञान और सत्य का प्रतीक है।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि तारकासुर केवल एक राक्षस नहीं था। वह हमारे भीतर के अहंकार, भय और अज्ञान का प्रतीक है। जब हम साहस और विवेक से काम लेते हैं, तब हम भी अपने “तारकासुर” पर विजय पा सकते हैं।
आज के समय में, जब जीवन भागदौड़ से भरा है और तनाव आम बात हो गई है, ऐसे पर्व हमें ठहरकर सोचने का अवसर देते हैं। वे याद दिलाते हैं कि शक्ति केवल बाहुबल में नहीं, बल्कि धैर्य और समझ में भी होती है।
इस बार युवाओं में भी खास उत्साह देखा गया। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर मंदिरों की तस्वीरें साझा कीं। कुछ ने अपने अनुभव लिखे।
दिलचस्प बात यह रही कि कई युवा केवल परंपरा निभाने नहीं, बल्कि उसे समझने भी पहुँचे। वे कथा जानना चाहते थे। वे यह समझना चाहते थे कि मुरुगन का प्रतीक क्या है। यह संकेत है कि परंपराएँ केवल पुरानी नहीं हो रहीं, बल्कि नए रूप में आगे बढ़ रही हैं।
शाम होते-होते मंदिरों में दीपों की रोशनी जगमगाने लगी। विशेष आरती के साथ दिन का मुख्य आयोजन संपन्न हुआ। थके हुए, लेकिन संतुष्ट चेहरे घर लौटते दिखे।
वैकासी विसाकम केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है। यह विश्वास का दिन है। यह साहस की याद दिलाने वाला पर्व है। यह बताता है कि जब जीवन में चुनौतियाँ आएँ, तो घबराएँ नहीं अपने भीतर के प्रकाश को पहचानें।
और शायद यही भगवान मुरुगन के जन्मोत्सव का सबसे सुंदर संदेश है ज्ञान से अज्ञान पर, और साहस से भय पर विजय।