Aja Ekadashi 2026 – तिथि, व्रत कथा, महत्व, पूजा विधि और व्रत नियम

Aja Ekadashi Puja Vidhi and Importance

अजा एकादशी सनातन धर्म की उन विशेष एकादशियों में से एक मानी जाती है, जिनका संबंध कर्मदोष से मुक्ति, पापों के नाश और आत्मिक शुद्धि से जुड़ा हुआ है। यह एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान विष्णु को समर्पित होती है। शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य अपने जीवन में जाने-अनजाने अनेक ऐसे कर्म कर बैठता है, जिनका प्रभाव उसके वर्तमान और भविष्य दोनों पर पड़ता है। ऐसे में अजा एकादशी का व्रत उन पापों से मुक्ति का मार्ग प्रदान करता है, जिनका प्रायश्चित सामान्य उपायों से संभव नहीं होता।

भविष्य पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि Aja Ekadashi 2026 का व्रत करने से मनुष्य को केवल सांसारिक कष्टों से ही राहत नहीं मिलती, बल्कि उसका मन भी शुद्ध होता है और वह धर्म व सत्य के मार्ग पर स्थिर होता है। यही कारण है कि इस एकादशी को पापों से “अलग” करने वाली एकादशी कहा गया है। श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत जीवन में नई सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।

Aja Ekadashi 2026 – तिथि और पारण समय

अजा एकादशी का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब व्रत सही तिथि और पारण समय के अनुसार किया जाए।

विवरणतिथि / समय
एकादशी तिथि प्रारंभ7 सितंबर 2026, रात 08:45 बजे
एकादशी तिथि समाप्त8 सितंबर 2026, रात 11:16 बजे
व्रत रखने का दिन8 सितंबर 2026
पारण का समय9 सितंबर 2026, सुबह 06:08 से 08:29 बजे
द्वादशी तिथि समाप्त9 सितंबर 2026, शाम 06:12 बजे

Aja Ekadashi Vrat Katha – भविष्य पुराण से सम्पूर्ण, मूल कथा

भविष्य पुराण के अनुसार, एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रतापूर्वक प्रश्न किया:
हे माधव! भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी को इतना प्रभावशाली क्यों माना जाता है? कृपा करके इसकी सम्पूर्ण कथा और इससे प्राप्त होने वाले फल का वर्णन कीजिए।

भगवान श्रीकृष्ण बोले:
हे राजन्! अजा एकादशी ऐसा व्रत है, जो मनुष्य को उसके किए गए पापों से अलग कर देता है। मैं तुम्हें इसकी वह पवित्र कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनकर भी जीव के पाप क्षीण होने लगते हैं।

प्राचीन काल में हस्तिनापुर में राजा हरिश्चंद्र नामक एक महान सत्यवादी राजा राज्य करता था। उसका जीवन सत्य, दान और धर्म के उच्च आदर्शों पर आधारित था। उसने अपने जीवन में कभी भी असत्य का मार्ग नहीं अपनाया। किंतु सत्य की रक्षा करते-करते उसे अपने राज्य, वैभव, पत्नी तारामती और पुत्र रोहिताश्व तक का त्याग करना पड़ा।

भाग्य की कठोर परीक्षा के कारण राजा हरिश्चंद्र काशी में एक चांडाल के अधीन श्मशान में कार्य करने को विवश हुआ। वहाँ उसे अपमान, भूख और असहनीय मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। उसकी पत्नी तारामती भी अनेक कष्टों से गुजर रही थी, फिर भी दोनों ने धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। यह उनका सबसे बड़ा गुण था।

इसी कठिन समय में राजा की भेंट महर्षि गौतम से हुई। राजा ने विनम्रतापूर्वक अपनी व्यथा ऋषि को सुनाई। महर्षि गौतम ने ध्यानस्थ होकर राजा के पूर्व कर्मों को देखा और कहा:

हे राजन्! यह सब तुम्हारे पूर्व जन्म और वर्तमान जीवन के कर्मों का फल है। किंतु यदि तुम भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक करोगे, तो तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।

राजा हरिश्चंद्र ने इस व्रत को पूर्ण निष्ठा के साथ किया। उसने प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का ध्यान किया, पूरे दिन उपवास रखा और रात्रि में जागरण कर हरि-नाम का स्मरण किया। इस व्रत के प्रभाव से देवताओं ने उसकी परीक्षा समाप्त की। राजा को पुनः उसका राज्य, पत्नी और पुत्र प्राप्त हुए और उसका यश चारों ओर फैल गया।

भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से बोले:
हे राजन्! इसी कारण यह एकादशी अजा कहलाती है, क्योंकि यह मनुष्य को उसके पापों से अलग कर देती है और उसे धर्म के मार्ग पर पुनः स्थापित करती है।

अजा एकादशी का महत्व (Aja Ekadashi Importance)

अजा एकादशी की पूजा विधि सरल होने के साथ-साथ अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है। व्रतधारी को प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ, सात्त्विक वस्त्र धारण करने चाहिए। घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें। चंदन, पुष्प, दीप, धूप और तुलसी-दल अर्पित करें।

पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। पूरे दिन उपवास रखते हुए मन को शांत और संयमित रखें। रात्रि में जागरण कर हरि-भजन और कीर्तन करना विशेष फलदायी माना गया है।

पूजा विधि – अजा एकादशी व्रत कैसे करें

इस व्रत की पूजा विधि सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ और सात्त्विक वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें। चंदन, पुष्प, दीप, धूप और तुलसी-दल अर्पित करें।

पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। दिनभर उपवास रखें और रात्रि में जागरण कर हरि-भजन करें।

व्रत नियम – अजा एकादशी में क्या पालन करें

इस व्रत के दिन अनाज, चावल, दाल, मांसाहार, प्याज और लहसुन का त्याग करना चाहिए। मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना आवश्यक है। झूठ, क्रोध, निंदा, हिंसा और अहंकार से दूरी बनाए रखें। फलाहार, दूध और सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। संयम और श्रद्धा इस व्रत के मुख्य आधार हैं।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
भगवान विष्णु की पूजा करेंअनाज व तामसिक भोजन
उपवास और मंत्र जप करेंझूठ और छल
रात्रि जागरण करेंक्रोध और विवाद
दान-पुण्य करेंआलस्य

Aja Ekadashi FAQs

Q1. अजा एकादशी का व्रत क्यों किया जाता है?
यह व्रत पापों के नाश और आत्मिक शुद्धि के लिए किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत मनुष्य को उसके कर्मदोष से मुक्त कर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।
अजा एकादशी की कथा भविष्य पुराण में वर्णित है, जहाँ राजा हरिश्चंद्र के जीवन प्रसंग के माध्यम से इस व्रत का महत्व समझाया गया है।
हाँ, यह व्रत गृहस्थों के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो मानसिक तनाव या अपयश से ग्रस्त हों।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप इस दिन विशेष रूप से फलदायी माना गया है।
इस व्रत का पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद निर्धारित शुभ समय पर करना चाहिए, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

अजा एकादशी कथा – YouTube वीडियो

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