देवउठनी एकादशी – Dev Uthani (Prabodhini) Ekadashi का आध्यात्मिक महत्व, व्रत कथा, पूजा विधि और नियम

Dev Uthani Ekadashi Vishnu Puja and Tulsi Vivah

सनातन धर्म में कार्तिक मास को अत्यंत पवित्र माना गया है और इसी मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी और Dev Uthani Ekadashi के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास का समापन होता है। यही कारण है कि इस एकादशी के साथ ही विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों का पुनः आरंभ माना जाता है।

देवउठनी एकादशी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से एक परिवर्तन का संकेत है। यह दिन आत्मसंयम, भक्ति और शुद्ध जीवन की ओर लौटने का अवसर प्रदान करता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया व्रत पापों का नाश करता है, जीवन में शुभता लाता है और ईश्वर से निकटता बढ़ाता है। कार्तिक मास में होने के कारण इस एकादशी का पुण्यफल और भी अधिक प्रभावशाली माना गया है।

Dev Uthani Ekadashi 2026 – तिथि और पारण का महत्व

देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन व्रत रखकर अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करने का विधान है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि पारण के बिना एकादशी व्रत अधूरा माना जाता है। पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना आवश्यक बताया गया है।

देवउठनी एकादशी का पारण विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी के साथ चातुर्मास का समापन होता है। पारण के समय सात्त्विक भोजन ग्रहण कर भगवान विष्णु का स्मरण करने से व्रत की पूर्णता मानी जाती है।

विवरणतिथि / समय
एकादशी तिथि प्रारंभ21 नवंबर 2026, शनिवार – प्रातः 07:18 बजे
एकादशी तिथि समाप्त22 नवंबर 2026, रविवार – प्रातः 09:04 बजे
व्रत रखने का दिन21 नवंबर 2026 (शनिवार)
पारण का समय22 नवंबर 2026, प्रातः 06:47 से 08:56 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त22 नवंबर 2026, दोपहर 12:31 बजे

Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha – भगवान विष्णु के जागरण की सम्पूर्ण, विस्तृत और शास्त्रसम्मत कथा

धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की उस एकादशी के विषय में प्रश्न किया, जिसे देवउठनी, प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है। युधिष्ठिर ने जानना चाहा कि इस एकादशी का इतना विशेष महत्व क्यों है और इस दिन भगवान विष्णु के जागरण की मान्यता कैसे प्रारंभ हुई।

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए कहा कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है, उस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके बाद चार मास तक, जिसे चातुर्मास कहा जाता है, सृष्टि का संचालन संयम, तप और नियम के माध्यम से होता है। इस अवधि में देवता भी अधिक सक्रिय नहीं रहते और मानव जाति के लिए यह काल आत्मसंयम और साधना का माना जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि चातुर्मास के दौरान पृथ्वी पर विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं, क्योंकि यह समय बाहरी उत्सवों के बजाय आंतरिक शुद्धि और आत्मचिंतन का होता है। साधु-संत, ऋषि-मुनि और गृहस्थ सभी इस काल में संयम का पालन करते हैं और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं।

चार मास की योगनिद्रा के पश्चात्, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसी दिव्य घटना के कारण इस एकादशी को देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के जागरण से सृष्टि में पुनः सक्रियता आती है और शुभ कार्यों का आरंभ संभव हो जाता है।

कथा के अनुसार, देवउठनी एकादशी के दिन देवता, ऋषि और गंधर्व भगवान विष्णु के जागरण का उत्सव मनाते हैं। ब्रह्मा, शिव और अन्य देवगण भगवान विष्णु की स्तुति करते हैं और उनसे सृष्टि के पुनः संचालन का अनुरोध करते हैं। भगवान विष्णु करुणा भाव से सृष्टि की रक्षा और धर्म की स्थापना का संकल्प लेते हैं।

इसी दिन तुलसी विवाह का भी विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, तुलसी माता भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। देवउठनी एकादशी के दिन शालिग्राम स्वरूप भगवान विष्णु और तुलसी माता का पवित्र विवाह संपन्न किया जाता है। यह विवाह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भक्ति, त्याग और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से तुलसी विवाह करता है, उसे कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो व्यक्ति देवउठनी एकादशी का व्रत श्रद्धा, नियम और संयम के साथ करता है, वह चातुर्मास के दौरान किए गए सभी तप और संयम का पूर्ण फल प्राप्त करता है। इस व्रत से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं, जीवन में रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं और मानसिक तथा आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।

कथा में यह भी बताया गया है कि देवउठनी एकादशी केवल भगवान विष्णु के जागरण का पर्व नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर सोई हुई चेतना के जागरण का प्रतीक है। जिस प्रकार भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागकर सृष्टि को पुनः गति प्रदान करते हैं, उसी प्रकार यह एकादशी मनुष्य को आलस्य, अज्ञान और अधर्म से बाहर निकलकर धर्म, कर्म और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अंत में युधिष्ठिर से कहा कि जो श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है, दान-पुण्य करता है और तुलसी माता का पूजन करता है, उसके जीवन में शुभता, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति अवश्य आती है। देवउठनी एकादशी इसी जागरण, नव आरंभ और ईश्वर कृपा का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग दिखाता है।

देवउठनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

Dev Uthani Ekadashi का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह एकादशी आत्मसंयम, भक्ति और पुनर्जागरण का प्रतीक मानी जाती है। चार माह तक संयम का पालन करने के बाद यह दिन साधकों को नई ऊर्जा और सकारात्मकता प्रदान करता है।

मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से जीवन में रुके हुए कार्य पुनः गति पकड़ते हैं। विवाह, संस्कार और शुभ कार्यों का आरंभ इसी एकादशी से किया जाता है, जो इसे सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी विशेष बनाता है।

Dev Uthani Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में भगवान विष्णु, शालिग्राम और तुलसी माता की पूजा करें। दीप, धूप, पुष्प, चंदन और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी विवाह की विधि संपन्न करें।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। संध्या समय आरती कर भगवान के जागरण का स्मरण करें। यह पूजा मन और आत्मा दोनों को पवित्र करती है।

Dev Uthani Ekadashi Vrat Rules – व्रत नियम और संयम

देवउठनी एकादशी के व्रत में अनाज, मांसाहार, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करना चाहिए। व्रती को क्रोध, निंदा और झूठ से दूर रहना चाहिए। फलाहार या जल से व्रत किया जा सकता है।

शास्त्रों के अनुसार, सच्चा व्रत वही है जिसमें मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनी रहे। इस दिन दान-पुण्य करना विशेष फलदायी माना गया है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
भगवान विष्णु और तुलसी पूजातामसिक भोजन
तुलसी विवाह संपन्न करेंक्रोध और विवाद
उपवास और संयमझूठ और छल
दान-पुण्यनशा
सात्त्विक जीवनआलस्य

Dev Uthani Ekadashi FAQs

Q1. Dev Uthani Ekadashi क्यों मनाई जाती है?
देवउठनी एकादशी भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागरण का प्रतीक है। इसी के साथ चातुर्मास समाप्त होता है और शुभ कार्यों का पुनः आरंभ माना जाता है।
यह व्रत पापों के नाश, आत्मिक शुद्धि और जीवन में शुभता के लिए किया जाता है। शास्त्रों में इसे अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
तुलसी विवाह इसी दिन किया जाता है, जो शालिग्राम और तुलसी माता के पवित्र मिलन का प्रतीक है। इसे कन्यादान के समान पुण्यदायी माना गया है।
यह व्रत गृहस्थ, वृद्ध और युवा सभी कर सकते हैं। श्रद्धा और नियम का पालन इसकी मुख्य शर्त है।
2026 में यह एकादशी चातुर्मास के समापन के साथ आती है, जिससे इसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

देवउठनी एकादशी कथा – YouTube वीडियो

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