पद्मिनी एकादशी एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ एकादशी है जो केवल अधिमास (मलमास) के दौरान ही आती है। पूरे वर्ष में यह एक ही बार आती है और इसे अत्यंत पुण्यदायिनी, मोक्षदायिनी, कल्पवृक्ष तुल्य और रथयात्रा-हज़ार यज्ञ के बराबर फल देने वाली एकादशी कहा गया है। Padmini Ekadashi उन लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है जो मन, जीवन और कर्म—तीनों स्तरों पर शुद्धि चाहते हैं। यह व्रत सौभाग्य, आरोग्य, समृद्धि, दीर्घायु और मनोकामना पूर्ति देने वाला माना जाता है।
पुराणों में वर्णित है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से समस्त पाप, दुख, भय, रोग, कष्ट और बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं। यह व्रत उन लोगों के लिए अत्यधिक शुभ है जिनके जीवन में देरी, संकट, ग्रहदोष, नकारात्मक ऊर्जा, दुर्भाग्य या मानसिक उलझनें बढ़ गई हों। यह एकादशी साधक को अद्वितीय पुण्य देकर उसे ईश्वर के अत्यंत निकट ले जाती है।
| विवरण | समय / तिथि |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 30 अगस्त 2026, रात 12:40 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 31 अगस्त 2026, रात 10:15 बजे |
| पारण का समय | 1 सितंबर 2026, सुबह 06:20 बजे से 08:42 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 1 सितंबर 2026, शाम 07:10 बजे |
पुराणों में वर्णित है कि प्राचीन काल में महिष्मति नामक नगरी में कृतवीर्य नाम के एक प्रसिद्ध, धर्मनिष्ठ और पराक्रमी राजा का शासन था। राजा साहसी, न्यायप्रिय और अपनी प्रजा के प्रति अत्यंत दयालु थे, परंतु उनके जीवन में एक बड़ी कमी थी—वे संतानहीन थे। राज्य की समृद्धि, वैभव और सत्ता होने के बावजूद उनका हृदय खाली था। संतान प्राप्ति की गहरी इच्छा ने उन्हें भीतर से विचलित कर रखा था। वर्षों तक पूजा, यज्ञ, दान और अनेक प्रयास करने के बाद भी उन्हें संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ। अंततः दुखी होकर उन्होंने राज्य का कार्यभार मंत्रियों को सौंपा और अपनी रानी के साथ वन में कठोर तपस्या करने का निर्णय लिया।
राजा और रानी गहन वन में गए और वर्षों तक कठिन तप में लीन रहे। धूप-धूल, वर्षा और कड़कड़ाती ठंड में बैठकर उन्होंने भगवान के प्रति अटूट भक्ति दिखाई। धीरे-धीरे उनका शरीर क्षीण होने लगा, परंतु संतान प्राप्ति की आशा में वे तप करते रहे। एक दिन उनके तपोवन में तेजस्वी और महान तपस्वी महर्षि सुव्रत पहुँचे। उन्होंने राजा और रानी को दुर्बल और तपस्या में मग्न देखकर पूछा—“हे राजन! आप कौन हैं और किस उद्देश्य से इतनी कठोर तपस्या कर रहे हैं?” राजा कृतवीर्य ने विनम्रता से उत्तर दिया—“हे ऋषिवर! मैं राज्य का राजा हूँ, परंतु संतान न होने के कारण जीवन अधूरा लग रहा है। सभी उपाय करने के बाद भी संतान प्राप्ति नहीं हुई, इसलिए यहाँ तप कर रहा हूँ।”
ऋषि सुव्रत ने उनकी बात सुनकर करुणा पूर्वक कहा “हे राजन! आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी, परंतु आपकी समस्या का समाधान किसी साधारण यज्ञ या तप में नहीं है। इसके लिए आपको Padmini Ekadashi Vrat करना होगा। यह एकादशी अत्यंत दुर्लभ है, क्योंकि यह केवल अधिमास में आती है। इसका व्रत करने से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। इस व्रत की शक्ति इतनी दिव्य है कि यह संतानहीन को संतान, रोगी को आरोग्य, दरिद्र को धन और दुखी को सुख प्रदान करती है।” ऋषि के शब्द सुनकर राजा और रानी के हृदय में आशा जाग उठी।
अगली अधिमास की पद्मिनी एकादशी आने पर राजा और रानी ने पूर्ण विधि-विधान से व्रत रखा। प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा की, धूप-दीप अर्पित किए, मंत्रजाप किया और दिनभर उपवास रखा। उनका मन पूर्ण भक्ति और पवित्रता से भर गया था। रात्रि में उन्होंने जागरण किया और भगवान के भजन गाए। द्वादशी को जैसे ही उन्होंने पारण किया, उसी क्षण आकाश में दिव्य प्रकाश फैला और स्वर्ग से आवाज आई—“हे राजन! पद्मिनी एकादशी के प्रभाव से तुम संतानहीनता के दुख से मुक्त हो चुके हो। शीघ्र ही तुम्हारे घर तेजस्वी, बलवान और महान पुत्र का जन्म होगा।”
ऋषि के वचन और व्रत के फल के अनुसार समय आने पर रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर महान योद्धा के रूप में ख्याति प्राप्त की। राजा का जीवन पूर्ण हो गया, और पद्मिनी एकादशी संसार में सर्वकामप्रदा, अत्यंत दुर्लभ और कृतार्थ करने वाली एकादशी के रूप में प्रसिद्ध हुई।
इसीलिए कहा गया है कि Padmini Ekadashi Vrat मनुष्य के जीवन में असंभव को संभव कर देता है, बाधाओं को दूर करता है और मनोकामनाएँ पूर्ण करता है। यह भक्त के जीवन में दिव्य ऊर्जा, सौभाग्य, संतान सुख और आध्यात्मिक उन्नति लाने वाली सर्वोत्तम एकादशी मानी गई है।
पद्मिनी एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की मूर्ति को स्थापित करें और गंगाजल से शुद्ध करें। चंदन, धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, तुलसी, फल और पंचामृत अर्पित करें। Padmini Ekadashi 2026 का संकल्प लें और उपवास का नियम अपनाएँ। दिनभर भजन-कीर्तन करें, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, दान करें और सात्त्विकता बनाए रखें।
रात्रि में ध्यान या विष्णु मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करना अत्यंत शुभ है। द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद पारण समय में पूजा कर व्रत खोलें।
इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, प्याज, लहसुन, मांसाहार और शराब का त्याग आवश्यक है। मन, वचन और कर्म की पवित्रता मुख्य नियम है। दिन भर क्रोध, विवाद, झूठ, नकारात्मक विचार और किसी भी प्रकार के पापकर्म से दूर रहें। फलाहार, दूध, मेवा तथा सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। दान, सेवा और भक्ति से व्रत का फल अनेक गुना बढ़ जाता है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| विष्णु पूजा, जप, ध्यान | अनाज, चावल, दाल |
| फलाहार और सात्त्विक भोजन | मांसाहार, शराब |
| दान और सेवा | झूठ, क्रोध |
| दीपदान और भजन | नकारात्मक विचार |
| रात में ध्यान | गलत संगति |
पुराणों में लिखा है कि आंवला भगवान विष्णु का प्रिय वृक्ष है और इसे उनकी ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। Amalaki Ekadashi Vrat में आंवले की पूजा करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।