सनातन धर्म में एकादशी व्रतों को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी माना गया है, किंतु इंदिरा एकादशी का स्थान इन सभी में विशिष्ट है। यह एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आती है और इसका सीधा संबंध पितरों की शांति, पितृ दोष निवारण और पूर्वजों की मुक्ति से जोड़ा गया है। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि Indira Ekadashi का व्रत केवल वर्तमान जीवन को ही नहीं, बल्कि पूर्व जन्मों और पितृ लोक से जुड़े बंधनों को भी शुद्ध करता है।
इंदिरा एकादशी का व्रत उस समय आता है, जब पितृ पक्ष का प्रारंभ समीप होता है। ऐसे में यह एकादशी पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्मों की आध्यात्मिक तैयारी मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना और उपवास करने से वे भक्त के पितरों को नरक यातनाओं से मुक्त कर स्वर्गलोक में स्थान प्रदान करते हैं।
यह एकादशी केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और आत्मशुद्धि का पर्व है। जो व्यक्ति अपने पूर्वजों के ऋण को स्वीकार करता है और श्रद्धा से इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन में स्थिरता, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
इंदिरा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन व्रत रखने का विधान है और द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, बिना पारण के व्रत अपूर्ण रहता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
पारण का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसे सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना आवश्यक माना गया है। इस दौरान सात्त्विक भोजन ग्रहण कर भगवान विष्णु का स्मरण करना व्रत की पूर्णता का प्रतीक है।
| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 6 अक्टूबर 2026, भाद्रपद कृष्ण पक्ष |
| एकादशी तिथि समाप्त | 6 अक्टूबर 2026 (रात तक) |
| व्रत रखने का दिन | मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 |
| पारण का समय | 7 अक्टूबर 2026, द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद |
| द्वादशी तिथि समाप्त | पंचांग अनुसार |
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया:
हे जनार्दन! भाद्रपद कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का क्या महत्व है और यह पितरों की मुक्ति कैसे प्रदान करती है?
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया:
हे राजन्! यह एकादशी पितरों को नरक यातनाओं से मुक्त करने वाली है। इसकी कथा सुनने मात्र से भी मनुष्य को महान पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्राचीन काल में महिष्मति नगरी में इंद्रसेन नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और सदैव धर्म, सत्य और दान के मार्ग पर चलते थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके राजदरबार में पधारे। राजा ने श्रद्धा से उनका स्वागत किया।
नारद मुनि ने राजा इंद्रसेन को बताया कि उनके पितृ अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण नरक में यातनाएँ भोग रहे हैं। यह सुनकर राजा अत्यंत व्याकुल हो गए और उन्होंने अपने पितरों की मुक्ति का उपाय पूछा।
देवर्षि नारद ने कहा:
हे राजन्! भाद्रपद कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत करने से आपके पितरों को नरक से मुक्ति प्राप्त होगी।
राजा इंद्रसेन ने पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ Indira Ekadashi Vrat का पालन किया। उन्होंने दिनभर उपवास रखा, भगवान विष्णु की पूजा की, रात्रि में जागरण किया और द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पारण किया।
व्रत के प्रभाव से उनके पितरों को नरक यातनाओं से मुक्ति मिली और उन्हें स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त हुआ। आकाशवाणी हुई कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से इंदिरा एकादशी का व्रत करेगा, उसके पितर तृप्त होंगे।
यह कथा सिखाती है कि संतान द्वारा किया गया धर्म और भक्ति पितरों के लिए भी कल्याणकारी होती है।
Indira Ekadashi का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह एकादशी मनुष्य को अपने कर्मों की जिम्मेदारी का बोध कराती है। पितरों के प्रति कृतज्ञता और ऋण स्वीकार करने की भावना इस व्रत का मूल तत्व है।
मान्यता है कि इस दिन किया गया व्रत पितृ दोष, मानसिक अशांति और पारिवारिक क्लेश को शांत करता है। यह एकादशी आत्मशुद्धि, विनम्रता और धर्म पालन का मार्ग दिखाती है।
इंदिरा एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम स्थापित करें। दीप, धूप, पुष्प, चंदन और तुलसी दल अर्पित करें।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। पितरों के निमित्त जल और तिल का दान करना विशेष फलदायी माना गया है।
इस व्रत में अनाज, मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करना चाहिए। व्रती को चाहिए कि वह क्रोध, निंदा और झूठ से दूर रहे।
फलाहार या जल से व्रत किया जा सकता है, लेकिन आलस्य और भोग-विलास से बचना आवश्यक है। शास्त्रों में कहा गया है कि मन, वचन और कर्म की पवित्रता ही सच्चा व्रत है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| भगवान विष्णु की पूजा करें | तामसिक भोजन |
| पितरों के लिए दान करें | क्रोध और विवाद |
| उपवास और संयम रखें | झूठ और छल |
| रात्रि जागरण करें | नशा और हिंसा |
| विष्णु मंत्र जप करें | आलस्य |