मोहीनी एकादशी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली अत्यंत पुण्यदायिनी, मोह-नाशक, पाप-नाशक और मोक्षदायिनी एकादशी मानी जाती है। इस एकादशी का नाम “मोहीनी” भगवान विष्णु के उस दिव्य रूप पर आधारित है जिसमें उन्होंने अमृत को असुरों से बचाकर देवताओं को दिया था। Mohini Ekadashi उन लोगों के लिए विशेष रूप से शुभ है जो मन की उलझनों, भ्रम, नकारात्मक विचारों, पापभाव, कर्मिक बंधनों और मोह के कारण परेशान हैं।
शास्त्रों में लिखा है कि मोहीनी एकादशी का पालन करने से व्यक्ति के जीवन से मोह, लोभ, क्रोध, भ्रम, दुःख और भय समाप्त होते हैं। यह व्रत मन को स्थिर, शांत और सकारात्मक बनाता है। भगवान विष्णु का मोहीनी अवतार सत्य, धर्म, समर्पण और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह एकादशी मनुष्य को आध्यात्मिक शक्ति देती है और जीवन के कठिन निर्णयों में स्पष्टता प्रदान करती है।
| विवरण | समय / तिथि |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 26 अप्रैल 2026, सुबह 09:30 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 27 अप्रैल 2026, सुबह 07:10 बजे |
| पारण का समय | 28 अप्रैल 2026, सुबह 06:22 बजे से 08:35 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 28 अप्रैल 2026, शाम 05:40 बजे |
पुराणों के अनुसार प्राचीन समय में भद्रावलि नाम का एक पवित्र और शांत प्रदेश था। इस प्रदेश में धृतिमान नामक राजा का शासन था, जो अत्यंत धर्मात्मा, दानवीर और न्यायप्रिय थे। राजा धृतिमान सत्य के मार्ग पर चलते थे और प्रजा की रक्षा को अपना परम कर्तव्य मानते थे। उनके शासन में लोग सुख, शांति और समृद्धि का जीवन जीते थे।
एक दिन एक वृद्ध ब्राह्मण राजा के दरबार में आया। उसकी आंखों में दर्द था और मन व्याकुल। उसने राजा से कहा:
हे राजन! मेरा पुत्र पूरी तरह अधर्म में डूब चुका है। वह चोरी करता है, बुरे कार्यों में लिप्त है, माता-पिता का अनादर करता है और किसी की बात नहीं सुनता। मैं असहाय हूँ। कृपया उसका उद्धार करने का मार्ग बताइए।
राजा ब्राह्मण की व्यथा सुनकर अत्यंत दुखी हो गए। उन्होंने ब्राह्मण को अपने पास बैठाया और कहा:
हे ब्राह्मण, मनुष्य कभी भी पापों के अंधकार में इतना नहीं गिरता कि वह उठ न सके। ईश्वर की कृपा से हर पाप का समाधान है। तुम्हारे पुत्र को Mohini Ekadashi Vrat का पालन अवश्य करना चाहिए। यह व्रत भ्रम, मोह, पाप और अज्ञान का नाश करने वाला माना गया है।
राजा ने ब्राह्मण को मोहीनी एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा:
हे ब्राह्मण! यह वही एकादशी है जिसने देवताओं को अमृत प्राप्त करने में सहायता की थी। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए संघर्ष हुआ, तब भगवान विष्णु ने ‘मोहीनी’ रूप धारण किया। उन्होंने अपने दिव्य सौंदर्य और मोहिनी शक्ति से असुरों को मोहित कर दिया। असुर मंत्रमुग्ध हो गए और अमृत देवताओं को मिल गया। इस प्रकार, विष्णु के मोहीनी रूप ने असुरों का मोह नष्ट किया और देवताओं को जीवन दिया।
यह सुनकर ब्राह्मण अपने पुत्र के पास गया और उसे व्रत करने का आग्रह किया। प्रारंभ में पुत्र ने अनसुना किया, लेकिन पिता के प्रेम और भगवान की प्रेरणा से उसने Mohini Ekadashi Vrat करने का संकल्प लिया।
व्रत के दिन उसने स्नान किया, स्वच्छ वस्त्र पहने, फलाहार किया, भगवान विष्णु की पूजा की और पूरे दिन उपवास रखा। पूजा के दौरान उसने मंत्रजाप किया, भजन सुने, दान किया और मन को पवित्र बनाए रखने का प्रयास किया। रातभर उसने पापमय जीवन के कारण हुए दुखों को याद किया और सुधारने का दृढ़ निश्चय किया।
द्वादशी के पारण के समय जैसे ही उसने जल ग्रहण कर व्रत पूर्ण किया, उसी क्षण उसके भीतर दिव्य परिवर्तन महसूस हुआ। उसके हृदय से अज्ञान, मोह और पाप की प्रवृत्तियाँ समाप्त होने लगीं। कुछ ही समय में वह विनम्र, शांत, आज्ञाकारी और धार्मिक स्वभाव का बन गया।
राजा को यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता हुई। तभी आकाशवाणी हुई
हे ब्राह्मण! Mohini Ekadashi Vrat के प्रभाव से तुम्हारे पुत्र का उद्धार हुआ है। जो मनुष्य इस व्रत का पालन करता है, उसका भ्रम दूर होता है, पाप नष्ट होता है और मन में सत्य, सद्बुद्धि और प्रकाश का आगमन होता है। यह व्रत जीवन के मोहोपाधियों को समाप्त कर साधक को ईश्वर के निकट लाता है।
तब राजा धृतिमान ने घोषणा की
इस एकादशी का पालन हर वह व्यक्ति करे जो अपने मन की अशुद्धियों, बुरे कर्मों और नकारात्मक विचारों को मिटाकर दिव्य मार्ग पर चलना चाहता है।
इसी कारण Mohini Ekadashi Vrat विश्व में सबसे अधिक बुद्धि-वर्धक, पाप-नाशक और मोहनाशक व्रत माना जाता है।
मोहीनी एकादशी की पूजा प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करने से शुरू होती है। घर या मंदिर को शुद्ध करें और भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी माता की मूर्ति स्थापित करें। पूजन सामग्री में चंदन, अक्षत, धूप, दीप, फूल, तिल, तुलसी, फल और पंचामृत रखें।
पूजन के दौरान Mohini Ekadashi 2026 का संकल्प लेकर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। दिनभर उपवास रखें और सात्त्विकता बनाए रखें। इस व्रत में दया, करुणा, सत्य, क्षमा और संयम का पालन अनिवार्य है।
शाम को दीपदान करें और भजन-कीर्तन के साथ दिन पूरा करें। रात को आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ना या ध्यान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। अगले दिन द्वादशी पारण समय में भगवान विष्णु की आरती कर व्रत खोलें।
इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, तामसिक भोजन, मांसाहार, मद्यपान और प्याज-लहसुन का त्याग आवश्यक है। दिनभर मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखना मुख्य नियम है।
किसी भी जीव को कष्ट न दें, झूठ, क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहें। दान-पुण्य करना, भूखों को भोजन देना और भक्ति में मन लगाना इस व्रत को अत्यंत प्रभावी बनाता है।
शाम को दीपदान करें और भगवान विष्णु की आरती अवश्य करें। द्वादशी में पारण समय का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह व्रत की पूर्णता का आधार है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| विष्णु पूजा, जप और ध्यान | अनाज, चावल, दाल |
| सात्त्विक भोजन व फलाहार | मांस, मद्य, तामसिक भोजन |
| दान और सेवा | क्रोध, झूठ, अपशब्द |
| दीपदान और पाठ | नकारात्मक विचार |
| भजन-कीर्तन | गलत व्यवहार |