सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और महत्त्वपूर्ण माना गया है, किंतु मोक्षदा एकादशी विशेष रूप से उस प्रकार की एकादशी है जो मनुष्य को मुक्ति, मोक्ष, और पापों के नाश की ओर अग्रसर करती है। ‘मोक्षदा’ नाम का शाब्दिक अर्थ ही है — मुक्ति देने वाली। इसी अर्थ, इसी नाम और इसी कर्मफल के कारण यह एकादशी धर्मग्रंथों में शीर्ष व्रतों में गिनी जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी के हर व्रत का अपना प्रकाश और फल होता है, किन्तु मोक्षदा एकादशी का फल सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इसे करने मात्र से ही मनुष्य के समस्त पापों का नाश, पूर्व जन्मों के दोषों का क्षय और आत्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। यह व्रत उन साधकों के लिए विशेष फलदायी माना गया है जो जीवन में मोक्ष और ईश्वर की आराधना को सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं।
यह एकादशी विशेष रूप से अधर्म, पाप, लोभ, मोह, क्रोध, भय और बंधन जैसी नकारात्मकताओं से मुक्ति का मार्ग दिखाती है। जब मनुष्य विनम्रता, संयम और सच्चे मन से इस व्रत का पालन करता है, तो वह अपने जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन, सकारात्मक परिवर्तन और ईश्वरीय अनुभूति का अनुभव पाता है। यही कारण है कि इसे मोक्षदा एकादशी कहा गया है — मोक्ष देने वाली एकादशी।
उच्य धर्मग्रंथों में इस व्रत का उल्लेख गहन रूप से मिलता है, और ऋषि-मुनियों ने इसका पालन सदियों से किया है। साधारण जनों के लिए भी यह व्रत करुणा, दया, संयम और धर्म के मार्ग पर अग्रसर होने का अवसर प्रदान करता है।
मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है। यह तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार निर्धारित होती है और व्रत का समय, पारण समय तथा द्वादशी समाप्ति समय का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिना पारण के एकादशी व्रत अधूरा माना जाता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
परंपरा है कि पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले किया जाना चाहिए। यदि पारण में अनाज या भारी भोजन ग्रहण किया जाता है तो व्रत का फल कम हो सकता है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि व्रत तथा पारण — दोनों ही समय का ध्यान रखकर करने पर ही इस व्रत का पुण्य पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 25 दिसंबर 2026, शाम 05:28 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 26 दिसंबर 2026, शाम 07:14 बजे |
| व्रत रखने का दिन | 26 दिसंबर 2026 (Sunday) |
| पारण का शुभ समय | 27 दिसंबर 2026, सुबह 06:45 से 09:10 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 27 दिसंबर 2026, दोपहर 12:10 बजे |
मोक्षदा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गंभीर और गहन है। यह एकादशी मनुष्य को यह बोध कराती है कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य केवल सांसारिक सुख नहीं, बल्कि मोक्ष, आत्म-समाधि और ईश्वर-अनुभूति है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत नियम, संयम और श्रद्धा से करता है, उसके पाप क्षय होते हैं, उसकी आत्मा शुद्ध होती है और उसकी मनोकामनाएँ ईश्वर के अनुकूल हो जाती हैं। यह व्रत व्यक्ति की मानसिक स्थिरता, आध्यात्मिक चेतना, और धैर्य को भी मजबूत करता है।
मोक्षदा एकादशी के दिन प्रथम कार्य होता है — प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना। तत्पश्चात् भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम-तुलसी की स्थापना कर दीप, धूप, पुष्प, चंदन और फल अर्पित करें। मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
दिनभर उपवास रखते हुए भजन-कीर्तन, विष्णु सहस्रनाम या एकादशी की कथा का श्रवण करना अत्यन्त पुण्यदायी है। रात्रि जागरण तथा द्वादशी के समय विधिपूर्वक पारण को अति महत्वपूर्ण बताया गया है।
मोक्षदा एकादशी के व्रत में अनाज, मांसाहार, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करना चाहिए। व्रती को दिनभर क्रोध, निंदा, छल और झूठ से दूर रहना चाहिए। फलाहार, जल ग्रहण किया जा सकता है, लेकिन सात्त्विक भोजन श्रेष्ठ माना गया है।
शास्त्र कहते हैं कि शारीरिक व्रत से अधिक महत्वपूर्ण है मानसिक संयम और आचरण की पवित्रता। मन, वचन और कर्म से पवित्रता का पालन ही सच्चा व्रत बनाता है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| भगवान विष्णु की पूजा करें | अनाज व तामसिक भोजन |
| उपवास और मंत्र जप करें | झूठ और छल |
| रात्रि जागरण करें | क्रोध और विवाद |
| दान-पुण्य करें | आलस्य |
मोक्षदा एकादशी भगवान विष्णु की कृपा से उत्पन्न देवी की स्मृति में मनाई जाती है। इसे पापों के नाश और मोक्ष-मार्ग की प्राप्ति का साधन माना गया है। इस दिन किया गया व्रत मनुष्य को संयम, भक्ति और सकारात्मक जीवन की ओर ले जाता है।
इस कथा में बताया गया है कि जब अधर्म चरम पर पहुँचता है, तब ईश्वर स्वयं धर्म की रक्षा के लिए दिव्य शक्ति उत्पन्न करते हैं। मोक्षदा एकादशी इसी दिव्य हस्तक्षेप और धर्म-विजय का प्रतीक है।
हाँ, यह व्रत गृहस्थ, वृद्ध, युवा सभी कर सकते हैं। विशेष रूप से वे लोग जिन्हें जीवन में मानसिक अशांति, पापबोध या नकारात्मकता का अनुभव हो, उनके लिए यह व्रत अत्यन्त फलदायी माना गया है।
इस व्रत से व्यक्ति के संचित पाप नष्ट होते हैं, मन शांत होता है और वह आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। साथ ही इसका सकारात्मक प्रभाव जीवन में सौभाग्य, स्थिरता और ईश्वर-सम्भावना की वृद्धि पर होता है।
इस व्रत का पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद निर्धारित शुभ समय पर करना चाहिए, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।