परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एक अत्यंत पावन और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एकादशी है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष स्थान इसलिए है क्योंकि इसका संबंध सीधे भगवान श्रीहरि विष्णु की योगनिद्रा से माना जाता है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और Parivartini Ekadashi के दिन वे शयन अवस्था में करवट बदलते हैं। इसी दिव्य परिवर्तन के कारण इस एकादशी को परिवर्तिनी कहा गया है।
परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एक अत्यंत पावन और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एकादशी है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष स्थान इसलिए है क्योंकि इसका संबंध सीधे भगवान श्रीहरि विष्णु की योगनिद्रा से माना जाता है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और Parivartini Ekadashi के दिन वे शयन अवस्था में करवट बदलते हैं। इसी दिव्य परिवर्तन के कारण इस एकादशी को परिवर्तिनी कहा गया है।
परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भक्तजन पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखते हैं और अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद विधिपूर्वक पारण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि बिना पारण के व्रत अधूरा माना जाता है, इसलिए सही समय पर पारण करना अत्यंत आवश्यक है। पारण के समय सात्त्विक भोजन ग्रहण कर भगवान विष्णु का स्मरण करना व्रत को पूर्णता प्रदान करता है।
| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 21 सितंबर 2026, रात 08:00 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 22 सितंबर 2026, रात 09:43 बजे |
| व्रत रखने का दिन | 22 सितंबर 2026 (मंगलवार) |
| पारण का समय | 23 सितंबर 2026, सुबह 06:10 बजे से 08:35 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 23 सितंबर 2026, रात 10:50 बजे |
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया:
हे केशव! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी का इतना महत्व क्यों बताया गया है? कृपया इसकी कथा और इसके पुण्यफल का वर्णन कीजिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने करुणा और माधुर्य से कहा:
हे राजन्! यह एकादशी भगवान विष्णु की योगनिद्रा और उनके परम भक्त की भक्ति से जुड़ी हुई है। इसकी कथा सुनने मात्र से भी मनुष्य के हृदय में भक्ति का संचार होता है।
प्राचीन काल में बलि महाराज नामक एक महान, दानवीर और सत्यनिष्ठ राजा हुए। यद्यपि वे असुर कुल में जन्मे थे, फिर भी वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनके जीवन का प्रत्येक कर्म दान, धर्म और सेवा से परिपूर्ण था। उन्होंने कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया।
बलि महाराज के यज्ञ और पुण्यकर्मों से तीनों लोकों में उनका यश फैल गया। देवताओं को भय होने लगा कि कहीं उनका अधिकार समाप्त न हो जाए। देवताओं की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और ब्राह्मण वेश में बलि महाराज के यज्ञ स्थल पर पहुँचे।
भगवान वामन ने बलि महाराज से तीन पग भूमि का दान माँगा। बलि महाराज ने गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद दान देने का संकल्प लिया, क्योंकि उनके लिए सत्य और दान सर्वोपरि था। भगवान वामन ने पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा, तब बलि महाराज ने विनम्रतापूर्वक अपना सिर आगे कर दिया।
भगवान विष्णु बलि महाराज की इस अद्भुत भक्ति और आत्मसमर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें पाताल लोक का अधिपति बनाया और यह वरदान दिया कि चातुर्मास के दौरान वे स्वयं उनके द्वारपाल बनेंगे। मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु पाताल लोक जाकर बलि महाराज से मिलते हैं।
यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति कुल, जाति या पद की मोहताज नहीं होती। जहाँ पूर्ण समर्पण होता है, वहाँ स्वयं भगवान भक्त के रक्षक बन जाते हैं।
परिवर्तिनी एकादशी का महत्व केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यह एकादशी व्यक्ति को अपने जीवन में आत्मपरिवर्तन करने की प्रेरणा देती है। इस दिन किया गया व्रत मनुष्य को अहंकार, लोभ, क्रोध और मोह जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।
मान्यता है कि जो भक्त इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके जीवन में मानसिक शांति, आत्मिक स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह एकादशी भक्ति मार्ग को दृढ़ करने और ईश्वर से निकटता बढ़ाने वाली मानी जाती है।
इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ और सात्त्विक वस्त्र धारण करने चाहिए। घर के मंदिर में भगवान विष्णु या शालिग्राम की स्थापना कर दीप प्रज्वलित करें। चंदन, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित करें। पूजा के समय मन को शांत रखें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें।
दिनभर उपवास रखते हुए भगवान के नाम का स्मरण करें। रात्रि में जागरण कर विष्णु सहस्रनाम, भजन और कथा श्रवण करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यह पूजा मन और आत्मा दोनों को पवित्र करती है।
परिवर्तिनी एकादशी के व्रत में शारीरिक उपवास के साथ-साथ मानसिक और आत्मिक संयम का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन अनाज, दाल, मांसाहार, प्याज और लहसुन का पूर्ण रूप से त्याग करना चाहिए। व्रती को चाहिए कि वह दिनभर भगवान विष्णु का स्मरण करे और अपने विचारों को शुद्ध बनाए रखे।
व्रत के दौरान क्रोध, ईर्ष्या, निंदा और झूठ से दूर रहना अत्यंत आवश्यक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार केवल भूखा रहना ही व्रत नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म की पवित्रता ही सच्चा व्रत कहलाती है। फलाहार या सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है, परंतु भोग-विलास और आलस्य से बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति परिवर्तिनी एकादशी के नियमों का श्रद्धा से पालन करता है, उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आता है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| भगवान विष्णु की पूजा और मंत्र जप | अनाज और तामसिक भोजन |
| उपवास और संयम का पालन | क्रोध और विवाद |
| तुलसी दल अर्पित करें | झूठ और छल |
| दान-पुण्य और सेवा भाव | आलस्य और अहंकार |
| रात्रि में हरि-भजन | नशा और हिंसा |