सनातन धर्म में कार्तिक मास का विशेष महत्व बताया गया है और इसी पवित्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली Rama Ekadashi को शास्त्रों में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। रमा एकादशी केवल एक उपवास तिथि नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, पापमोचन और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का अवसर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के संचित पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का संचार होता है।
कार्तिक मास स्वयं भगवान विष्णु को प्रिय माना गया है। ऐसे में कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया व्रत मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है। यही कारण है कि रमा एकादशी को पापों के नाश और सौभाग्य की वृद्धि करने वाली एकादशी कहा गया है।
यह एकादशी विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी मानी गई है जो अपने जीवन में किसी न किसी रूप में दोष, मानसिक अशांति या आध्यात्मिक शून्यता का अनुभव कर रहे हों। भक्ति, संयम और नियम के साथ किया गया Rama Ekadashi Vrat मनुष्य के अंतर्मन को शुद्ध करता है और ईश्वर के प्रति उसकी आस्था को दृढ़ बनाता है।
रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन उपवास रखकर अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करना शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है। बिना पारण के एकादशी व्रत अधूरा माना जाता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
पारण का समय विशेष सावधानी से चुनना चाहिए। धर्मशास्त्रों के अनुसार, पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना उचित होता है। पारण के समय सात्त्विक भोजन ग्रहण कर भगवान विष्णु का स्मरण करने से व्रत की पूर्णता मानी जाती है।
| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 13 नवंबर 2026, शुक्रवार – रात 09:18 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 14 नवंबर 2026, शनिवार – रात 10:27 बजे |
| व्रत रखने का दिन | 14 नवंबर 2026 (शनिवार) |
| पारण का समय | 15 नवंबर 2026, प्रातः 06:31 से 08:52 बजे तक |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 15 नवंबर 2026, रात 08:49 बजे |
धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के विषय में गहन जिज्ञासा प्रकट की। उन्होंने पूछा कि यह एकादशी मनुष्य के जीवन में पापों का नाश किस प्रकार करती है और इसका व्रत करने से कौन-सा विशेष फल प्राप्त होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए कहा कि रमा एकादशी उन पुण्य तिथियों में से है जो केवल वर्तमान जीवन ही नहीं, बल्कि पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव को भी शांत करने की शक्ति रखती है। यह एकादशी मनुष्य को यह अवसर देती है कि वह अपने जीवन में किए गए दोषों का आत्मविश्लेषण करे और ईश्वर की शरण में आकर सुधार का मार्ग अपनाए।
भगवान ने कथा का विस्तार करते हुए बताया कि प्राचीन काल में राजा मुचुकुंद नामक एक प्रतापी, धर्मनिष्ठ और सत्यप्रिय राजा राज्य करते थे। वे अपने शासन में न्याय, धर्म और प्रजा-कल्याण को सर्वोच्च मानते थे। उनके पुत्र चंद्रभानु प्रारंभ में संस्कारी और धर्मप्रिय था, किंतु युवावस्था में कुसंगति और भोग-विलास के कारण उसका मन धर्म से हट गया। धीरे-धीरे वह अहंकार, लोभ और अधर्म की ओर झुक गया।
चंद्रभानु ने अपने जीवन में अनेक ऐसे कर्म किए, जो शास्त्रों की दृष्टि में पापपूर्ण थे। उसे अपने कृत्यों का कोई पश्चाताप नहीं था और वह सांसारिक सुखों में डूबा रहा। समय आने पर उसकी मृत्यु हुई और उसके कर्मों के अनुसार उसे नरक यातनाओं का सामना करना पड़ा।
जब राजा मुचुकुंद को अपने पुत्र की दुर्दशा का ज्ञान हुआ, तो उनका हृदय शोक से भर उठा। उन्होंने अपने पुत्र के उद्धार के लिए देवर्षि नारद से मार्गदर्शन माँगा। देवर्षि नारद ने राजा को कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का महात्म्य सुनाया और बताया कि यह एकादशी पापों के नाश और उद्धार का श्रेष्ठ साधन है।
नारद मुनि के उपदेश से प्रेरित होकर राजा मुचुकुंद ने पूर्ण श्रद्धा, नियम और संयम के साथ Rama Ekadashi Vrat किया। उन्होंने प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा की, दिनभर उपवास रखा, दान-पुण्य किया और रात्रि में जागरण कर हरि-नाम का स्मरण किया। द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण कर उन्होंने अपने पुत्र के उद्धार की प्रार्थना की।
इस व्रत के प्रभाव से चंद्रभानु को नरक यातनाओं से मुक्ति मिली और उसे उत्तम गति प्राप्त हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि रमा एकादशी का व्रत केवल स्वयं के पापों के नाश के लिए ही नहीं, बल्कि अपने परिजनों और पूर्वजों के कल्याण के लिए भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
भगवान ने यह भी स्पष्ट किया कि रमा एकादशी का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है जब व्रत केवल बाहरी उपवास तक सीमित न रहे, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि के साथ किया जाए। जो व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से अपने दोषों को स्वीकार कर भगवान विष्णु की शरण में आता है, उसके लिए करुणा और उद्धार का मार्ग स्वयं खुल जाता है।
यह कथा यह संदेश देती है कि ईश्वर की कृपा केवल वर्तमान कर्मों पर ही नहीं, बल्कि पश्चाताप और सुधार की भावना पर भी आधारित होती है। रमा एकादशी इसी करुणा, आशा और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग दिखाती है।
Rama Ekadashi का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह एकादशी मनुष्य को अपने कर्मों का आत्मविश्लेषण करने और जीवन को धर्म के मार्ग पर पुनः स्थापित करने की प्रेरणा देती है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया व्रत अहंकार, लोभ और अधर्म की प्रवृत्तियों को शांत करता है।
कार्तिक मास में आने के कारण इस एकादशी का प्रभाव और भी बढ़ जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से मन को शांति, जीवन में स्थिरता और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है।
रमा एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ और सात्त्विक वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में भगवान विष्णु या शालिग्राम की स्थापना कर दीप प्रज्वलित करें। चंदन, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित करें।
पूजा के समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। दिनभर उपवास रखते हुए भगवान के नाम का स्मरण करें। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
रमा एकादशी के व्रत में शारीरिक उपवास के साथ-साथ मानसिक और आत्मिक संयम का विशेष महत्व है। इस दिन अनाज, मांसाहार, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करना चाहिए।
व्रती को क्रोध, निंदा, झूठ और छल से दूर रहना चाहिए। फलाहार या जल से व्रत किया जा सकता है, किंतु भोग-विलास और आलस्य से बचना आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार, मन-वचन-कर्म की पवित्रता ही सच्चा व्रत कहलाती है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| भगवान विष्णु की पूजा | तामसिक भोजन |
| उपवास और संयम | क्रोध और विवाद |
| दान-पुण्य | झूठ और छल |
| मंत्र जप व भजन | नशा |
| सात्त्विक जीवन | आलस्य |
Rama Ekadashi का व्रत गृहस्थ, वृद्ध, युवा और साधक सभी कर सकते हैं। विशेष रूप से वे लोग जो जीवन में बार-बार बाधाओं, मानसिक अशांति या आध्यात्मिक रिक्तता का अनुभव कर रहे हों, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है। श्रद्धा और संयम ही इसकी मुख्य शर्त है।