Shayani Ekadashi 2026 – तिथि, कथा, महत्व, पूजा विधि और उपवास नियम

Devshayani Ekadashi Vrat Katha – Complete Story in Hindi

शायनी एकादशी, जिसे आषाढ़ी एकादशी, देवशयनी एकादशी, हरि शयन एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ती है। यह एकादशी अत्यंत शुभ, मोक्षदायिनी और वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इस चार माह की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जो आध्यात्मिक साधना, भक्ति, व्रत और तपस्या का पवित्र समय है।

Shayani Ekadashi का व्रत करने से मनुष्य को अपार पुण्य प्राप्त होता है, पापों का क्षय होता है, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में स्थिरता, सौभाग्य व समृद्धि का आगमन होता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी है जो भक्ति बढ़ाना चाहते हैं, परिवार में शांति चाहते हैं या अपने जीवन में ईश्वर की कृपा का अनुभव करना चाहते हैं। महाराष्ट्र में यह एकादशी वारकरी संप्रदाय द्वारा अत्यंत श्रद्धा के साथ पंढरपुर वारी के रूप में मनाई जाती है।

Shayani Ekadashi 2026 – तिथि, मुहूर्त व पारण समय

विवरणसमय / तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ17 जुलाई 2026, सुबह 04:18 बजे
एकादशी तिथि समाप्त18 जुलाई 2026, सुबह 03:40 बजे
पारण का समय18 जुलाई 2026, सुबह 07:12 बजे से 09:20 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त18 जुलाई 2026, शाम 05:58 बजे

Shayani Ekadashi Vrat Katha – शायनी एकादशी की सम्पूर्ण, विस्तृत, पूर्ण कथा

पुराणों में वर्णित है कि सत्ययुग के समय में मंडाता नामक एक अत्यंत पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय राजा का शासन था। राजा मंडाता का राज्य समृद्धि, शांति और सुख से भरा हुआ था। लोग इतने संतुष्ट थे कि कहीं भी अपराध, पाप या अनाचार देखने को नहीं मिलता था। प्रजा सुखी थी और राजा को धर्मरक्षक के रूप में सम्मान देती थी। राजा स्वयं भी ईश्वर के भक्त, दानवीर और तपस्वी प्रकृति के थे। उनके राज्य में कभी कोई आपदा, विपत्ति या संकट नहीं आया।

लेकिन एक समय ऐसा आया जब राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा बिल्कुल नहीं हुई, नदियाँ सूखने लगीं, खेतों में फसल नष्ट हो गईं और पेड़ों पर फल तक नहीं उगे। पशु-पक्षी तक पानी के लिए भटकने लगे। प्रजा भूख-प्यास से व्याकुल होने लगी। राजा मंडाता अत्यंत चिंतित हो उठे—क्योंकि वे जानते थे कि किसी भी आपदा का कारण अक्सर किसी पाप या दोष का परिणाम होता है।

राजा ने तुरंत अपने सलाहकारों, विद्वानों और ब्राह्मणों को बुलाया और पूछा:
मुझे बताएं, मेरे राज्य में इस भयावह स्थिति का कारण क्या है? क्या मुझसे कोई अधर्म हुआ है? या प्रजा में किसी ने कोई गंभीर पाप किया है?

सबने राजा को आश्वासन दिया कि शासन उनके द्वारा अत्यंत धर्मपूर्ण रहा है। न राजा अधर्म कर सकता था, न ऐसी प्रजा में कोई बड़ा पाप होना संभव था। फिर भी वर्षा का न होना उन्हें बहुत विचलित कर रहा था। राजा ने सोचा कि अवश्य ही इस समस्या का समाधान पुण्य, तप और ईश्वर-भक्ति में है।

इसी मार्गदर्शन की खोज में राजा मंडाता ने हिमालय की यात्रा का निश्चय किया। वे कई दिनों तक जंगलों, पहाड़ों और नदियों को पार करते हुए अंततः महान तपस्वी ऋषि अंगिरा के आश्रम पहुँचे। ऋषि अंगिरा अपनी तपस्या, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति के लिए पूरे ब्रह्मांड में विख्यात थे।

राजा ने गहरी श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई
गुरुदेव, मेरे राज्य में बिना किसी पाप के भी वर्षा नहीं हो रही। लोग कष्ट में हैं। कृपया बताएं, इसका समाधान क्या है?

ऋषि अंगिरा ने अपने दिव्य ज्ञान से स्थिति का निरीक्षण किया और बोले
हे राजन्! इस अकाल का कारण न कोई पाप है और न कोई दोष। यह समय तुम्हें और तुम्हारी प्रजा को एक महान व्रत का पालन करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि तुम आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी शायनी या देवशयनी एकादशी का व्रत करोगे, तो भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे और वर्षा अवश्य होगी। यह व्रत इतना पवित्र है कि इससे समस्त पाप नष्ट होते हैं और संकट तुरंत दूर हो जाते हैं।

राजा ने श्रद्धा से कहा: गुरुदेव, मैं इस व्रत को अवश्य करूँगा।

राजा वापस लौटे और पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन सभी लोग उपवास करें, भगवान विष्णु की पूजा करें और रात्रि में जागरण करें। एकादशी का दिन आया। पूरा राज्य भक्ति में डूब गया। राजा स्वयं व्रत रखकर विष्णु की आराधना करने लगे। मंदिरों में दीप प्रज्ज्वलित हुए, पंडित मंत्रोच्चारण करने लगे, घर-घर में पूजा होने लगी। प्रजा ने भी पूरे मन से यह व्रत किया। रात्रि में जागरण हुआ। भजन-कीर्तन गूँजने लगे। हवा भी मानो भक्ति से महक रही थी।

द्वादशी की सुबह जैसे ही पारण किया गया
आकाश में अचानक बादल घिर आए। तेज गर्जना हुई और झमाझम वर्षा होने लगी| सूखी धरती पर जैसे जान लौट आई। लोग प्रसन्नता से झूम उठे। खेत फिर से हरे होने लगे, नदियाँ बहने लगीं, तालाब भर गए और जानवरों को पानी मिलने लगा।

राजा मंडाता ने पुनः ऋषि अंगिरा के पास जाकर धन्यवाद दिया, जिन्होंने कहा:
हे राजन्, भगवान विष्णु शायनी एकादशी के दिन योगनिद्रा में जाते हैं। इस व्रत को करने से न केवल वर्षा, बल्कि जीवन में स्थिरता, समृद्धि और शांति आती है। यह व्रत मनुष्य को पापों से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग देता है।

इसलिए इस एकादशी को “देवशयनी एकादशी” कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है—जो अध्यात्म, तप, साधना और भक्ति का काल है।

भक्त मानते हैं कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है, उसे सौभाग्य, शांति, धन, संतोष और प्रभु की अनंत कृपा प्राप्त होती है। शायनी एकादशी की कथा हमें यह संदेश देती है कि: ईश्वर-भक्ति किसी भी संकट को दूर कर सकती है, और जब मनुष्य सत्य, धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलता है, तो प्रकृति भी उसके पक्ष में हो जाती है।

Shayani Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

शायनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करें और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की स्थापना करें। पूजा में चंदन, रोली, पुष्प, तुलसी-दल, धूप, दीप, फल, नैवेद्य और पंचामृत का प्रयोग करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रतधारी को दिनभर सात्त्विकता बनाए रखनी चाहिए। मंदिर में दर्शन, दान-पुण्य, दीपदान और भगवान के भजन करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। अगले दिन द्वादशी में पारण समय देखकर व्रत खोलना चाहिए।

Shayani Ekadashi Vrat Rules – व्रत के नियम

इस व्रत में अनाज, चावल, दाल, तामसिक भोजन और मांसाहार पूर्णत: वर्जित हैं। साधक को मन, वचन और कर्म से सात्त्विक आचरण रखना चाहिए। क्रोध, झूठ, निंदा और विवाद से दूर रहें। फलाहार, दूध, मेवा, नारियल पानी और सात्त्विक आहार लिया जा सकता है। पारण का नियम अत्यंत महत्वपूर्ण है—द्वादशी के शुभ समय में व्रत तोड़ा जाए। शायनी एकादशी के व्रत में दान-पुण्य, विशेषकर अन्नदान, जलदान और गरीबों की सहायता, अति शुभ मानी गई है क्योंकि यह व्रत चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
विष्णु पूजा, जप और सहस्रनामअनाज, चावल, दाल
रात्रि जागरण और सत्संगतामसिक भोजन
दान-पुण्य, विशेषकर अन्नदानक्रोध और विवाद
भजन-कीर्तन और ध्याननकारात्मक विचार
चातुर्मास संकल्प लेनागलत संगति

FAQs - Shayani Ekadashi Vrat

Q1. Shayani Ekadashi 2026 का विशेष महत्व क्या है?
इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं, जिससे चातुर्मास आरंभ होता है। इस एकादशी का व्रत जीवन में सौभाग्य, पाप-क्षय, मानसिक शांति और प्रभु-कृपा प्रदान करता है।
राजा मंडाता की कथा बताती है कि जब समस्त उपाय विफल हो जाएँ, तब ईश्वर-भक्ति और व्रत साधना चमत्कारिक परिवर्तन ला सकती है। इस व्रत से राज्य में वर्षा और समृद्धि आई।
हाँ, रात्रि जागरण अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि इसी रात भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं। इस रात्रि भजन-कीर्तन करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।
फल, दूध, मेवा, नारियल पानी और सात्त्विक आहार लिया जा सकता है। अनाज, दाल, चावल और तामसिक भोजन वर्जित हैं।

यही वह दिन है जब भगवान विष्णु चार महीनों की योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी कारण इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जो तपस्या, साधना और भक्ति का समय है।

शायनी एकादशी कथा – YouTube वीडियो

Realetd Post