Shravana Putrada Ekadashi श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एक अत्यंत पुण्यदायिनी और फलदायी एकादशी मानी जाती है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व इसलिए बताया गया है क्योंकि यह व्रत संतान प्राप्ति, संतान सुख, वंश वृद्धि और पितृ तृप्ति से सीधे जुड़ा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को समर्पित यह एकादशी उन दंपत्तियों के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है जो संतान की कामना करते हैं या जिनकी संतान किसी प्रकार के कष्ट, रोग अथवा बाधा से पीड़ित होती है।
भविष्य पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि Shravana Putrada Ekadashi का व्रत न केवल संतान प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह पूर्व जन्मों के दोषों का नाश कर परिवार में सुख, शांति और स्थिरता प्रदान करता है। इसी कारण इस एकादशी को “पुत्रदा”, अर्थात पुत्र देने वाली एकादशी कहा गया है।
Shravana Putrada Ekadashi व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब इसे शास्त्रों में बताए गए सही समय पर किया जाए।
| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 23 अगस्त 2026, सुबह 06:18 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 24 अगस्त 2026, सुबह 04:45 बजे |
| व्रत रखने का दिन | 23 अगस्त 2026 |
| पारण का समय | 24 अगस्त 2026, सुबह 06:10 से 08:30 बजे |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 24 अगस्त 2026, शाम 06:55 बजे |
भविष्य पुराण के अनुसार एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया:
हे केशव! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी को इतना पुण्यदायी क्यों माना जाता है? कृपा करके इसकी सम्पूर्ण कथा और महत्व बताइए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:
हे राजन्! मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी की वह पवित्र कथा सुनाता हूँ, जिसके श्रवण मात्र से भी महान पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्राचीन काल में महिष्मति नगरी में राजा महिजित नामक एक अत्यंत धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ और न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। राजा वेद-शास्त्रों का ज्ञाता, ब्राह्मणों का सेवक और प्रजापालक था। उसका राज्य धर्म और न्याय से परिपूर्ण था, किंतु राजा और रानी दोनों ही संतानहीन थे। इस कारण राजा के मन में निरंतर यह चिंता बनी रहती थी कि उसके बाद वंश की निरंतरता और पितरों का उद्धार कैसे होगा।
राजा ने संतान प्राप्ति के लिए अनेक यज्ञ, दान, व्रत और तप किए, किंतु उसे सफलता नहीं मिली। अंततः समाधान की खोज में राजा वन की ओर गया। वहाँ उसकी भेंट महान तपस्वी महर्षि लोमेश से हुई। राजा ने दंडवत प्रणाम कर अपनी व्यथा ऋषि को सुनाई।
महर्षि लोमेश ने ध्यानस्थ होकर राजा के पूर्व जन्म के कर्मों को देखा और कहा:
हे राजन्! पूर्व जन्म में एक दोष हुआ था, जिसके कारण इस जन्म में तुम्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा। किंतु इसका प्रायश्चित संभव है।
राजा ने विनम्रता से उपाय पूछा। तब महर्षि लोमेश बोले:
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की Shravana Putrada Ekadashi का व्रत श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक करो। यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसके प्रभाव से तुम्हारे समस्त दोष नष्ट होंगे और तुम्हें उत्तम, धर्मपरायण पुत्र की प्राप्ति होगी।
राजा महिजित ने उसी क्षण व्रत का संकल्प लिया। नियत तिथि पर राजा और रानी ने प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए, भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की, पूरे दिन उपवास रखा और निरंतर विष्णु नाम का स्मरण किया। रात्रि में उन्होंने जागरण कर हरि-कथा और भजन-कीर्तन किया।
इस व्रत के प्रभाव से कुछ समय पश्चात रानी गर्भवती हुई और नियत समय पर राजा को एक तेजस्वी, बुद्धिमान और धर्मपरायण पुत्र की प्राप्ति हुई। संपूर्ण राज्य में आनंद छा गया।
भगवान श्रीकृष्ण ने अंत में युधिष्ठिर से कहा:
हे राजन्! इसी कारण यह एकादशी पुत्रदा कहलाती है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इस व्रत को करता है, उसे संतान सुख, पितृ तृप्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Putrada Ekadashi Vrat Vidhi के अनुसार इस दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ, सात्त्विक वस्त्र धारण करने चाहिए। घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें। चंदन, पुष्प, धूप, दीप, तुलसी-दल और फल अर्पित करें।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। संतान सुख की भावना के साथ पूरे दिन उपवास रखें। रात्रि में जागरण कर हरि-कीर्तन करें और अगले दिन द्वादशी तिथि में शुभ समय पर पारण करें।
Shravana Putrada Ekadashi Vrat Rules के अनुसार व्रत के दिन अनाज, चावल, दाल, मांसाहार, प्याज और लहसुन का पूर्ण त्याग करना चाहिए। मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना आवश्यक है। क्रोध, झूठ, निंदा और विवाद से दूर रहना चाहिए। फलाहार और सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। दंपत्तियों के लिए संयम और ब्रह्मचर्य का पालन विशेष शुभ माना गया है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| भगवान विष्णु की पूजा करें | अनाज व तामसिक भोजन |
| संतान सुख की प्रार्थना करें | क्रोध और विवाद |
| तुलसी-दल अर्पित करें | झूठ और निंदा |
| रात्रि जागरण करें | आलस्य |
| दान-पुण्य करें | पारण समय की अनदेखी |