उत्पन्ना एकादशी 2026 – Utpanna Ekadashi का आध्यात्मिक महत्व, व्रत कथा, पूजा विधि और नियम

Utpanna Ekadashi Vishnu Puja and Vrat

सनातन धर्म में मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी का विशेष स्थान है। शास्त्रों के अनुसार, यही वह तिथि है जब स्वयं भगवान विष्णु से एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ। इसलिए इस एकादशी को सभी एकादशियों की आदि-जननी भी कहा जाता है। मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है, भक्ति दृढ़ होती है और जीवन में धर्म का मार्ग प्रशस्त होता है।

धार्मिक दृष्टि से यह एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की विजय और आत्मिक जागरण का प्रतीक है। शास्त्रों में वर्णित कथा बताती है कि जब अधर्म अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया था, तब भगवान विष्णु से उत्पन्न शक्ति ने दानवों का नाश कर धर्म की स्थापना की। इसी कारण यह तिथि साधकों और भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

Utpanna Ekadashi 2026 – तिथि और पारण का महत्व

उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन व्रत रखकर अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करना शास्त्रसम्मत माना गया है। बिना पारण के व्रत अधूरा माना जाता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
विवरण तिथि / समय
एकादशी तिथि प्रारंभ 3 दिसंबर 2026, रात 11:03 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त 4 दिसंबर 2026, रात 11:45 बजे तक
व्रत रखने का दिन 4 दिसंबर 2026 (Friday)
पारण का समय 5 दिसंबर 2026, सुबह ~06:58 से ~09:05 बजे
द्वादशी तिथि समाप्त 6 दिसंबर 2026, रात ~12:52 बजे तक

Utpanna Ekadashi Vrat Katha – उत्पन्ना एकादशी की सम्पूर्ण, विस्तृत कथा

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है, केवल एक व्रत तिथि नहीं बल्कि एकादशी व्रत परंपरा की उत्पत्ति से जुड़ी अत्यंत पावन तिथि है। इसी कारण इसे सभी एकादशियों में विशेष स्थान प्राप्त है। शास्त्रों में यह कथा भगवान विष्णु की उस लीला से जुड़ी है, जहाँ धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए स्वयं एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ।

प्राचीन काल में मुर नामक एक भयानक असुर ने अपने तप और अहंकार के बल पर तीनों लोकों में आतंक फैला दिया था। देवता, ऋषि और मुनि उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में पहुँचे। मुर की शक्ति इतनी प्रबल थी कि उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और यज्ञ, तपस्या तथा धर्मिक कर्मों को नष्ट करना आरंभ कर दिया। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया कि धर्म की रक्षा अवश्य होगी।

भगवान विष्णु मुरासुर से युद्ध करने के लिए उसके नगर पहुँचे। यह युद्ध कई वर्षों तक चला, किंतु मुर अपनी मायावी शक्तियों के कारण पराजित नहीं हो रहा था। अंततः भगवान विष्णु ने युद्ध से कुछ समय विश्राम करने का निश्चय किया और बदरिकाश्रम के समीप एक गुफा में योगनिद्रा में प्रवेश किया। मुर ने इस अवसर को देखकर सोचा कि यही समय है विष्णु को पराजित करने का।

जैसे ही मुर भगवान विष्णु को मारने के लिए आगे बढ़ा, उसी क्षण भगवान विष्णु के तेज से एक दिव्य स्त्री शक्ति का प्राकट्य हुआ। वह तेजस्वी देवी असुर के सामने खड़ी हो गईं। उनके रूप में अद्भुत तेज, शांति और शक्ति का अद्भुत समन्वय था। देवी ने बिना किसी विलंब के मुरासुर का वध कर दिया।

जब भगवान विष्णु जागे और यह दृश्य देखा, तो उन्होंने देवी से पूछा:
तुम कौन हो, जिसने मेरे भक्तों और देवताओं की रक्षा की?

देवी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया:
प्रभु, मैं आपके ही तेज से उत्पन्न हुई हूँ। मैंने धर्म की रक्षा के लिए यह कार्य किया है।

भगवान विष्णु देवी की भक्ति, शक्ति और सेवा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने देवी को वरदान देते हुए कहा:

आज से तुम एकादशी के नाम से पूजी जाओगी। जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक एकादशी का व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट होंगे और उसे मोक्ष का मार्ग प्राप्त होगा।

चूँकि यह देवी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्न हुई थीं, इसलिए इस तिथि को उत्पन्ना एकादशी कहा गया। भगवान विष्णु ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त करता है।

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि उत्पन्ना एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि धर्म की उत्पत्ति, पापों के नाश और आत्मिक जागरण का प्रतीक है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस व्रत से व्यक्ति को न केवल सांसारिक दुखों से मुक्ति मिलती है, बल्कि उसके पूर्वजों को भी शांति प्राप्त होती है।

उत्पन्ना एकादशी की कथा यह सिखाती है कि जब अहंकार और अधर्म चरम पर पहुँचते हैं, तब ईश्वर स्वयं अपने तेज से धर्म की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि इस एकादशी को सभी एकादशियों की जननी कहा गया है और इसका व्रत विशेष पुण्यदायी माना गया है।

उत्पन्ना एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

Utpanna Ekadashi का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह एकादशी मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है। इस दिन किया गया व्रत अहंकार, लोभ और अधर्म की प्रवृत्तियों को शांत करता है।

मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने से भक्ति मार्ग दृढ़ होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। यह एकादशी आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का अवसर प्रदान करती है।

Utpanna Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम की स्थापना करें। दीप, धूप, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

दिनभर उपवास रखते हुए भगवान का स्मरण करें। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करना विशेष पुण्यदायी माना गया है।

Utpanna Ekadashi Vrat Rules – व्रत नियम और संयम

उत्पन्ना एकादशी के व्रत में अनाज, मांसाहार, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करना चाहिए। व्रती को क्रोध, निंदा और छल से दूर रहना चाहिए। फलाहार या जल से व्रत किया जा सकता है।

शास्त्रों के अनुसार, सच्चा व्रत वही है जिसमें मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनी रहे।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
भगवान विष्णु की पूजा करेंअनाज व तामसिक भोजन
उपवास और मंत्र जप करेंझूठ और छल
रात्रि जागरण करेंक्रोध और विवाद
दान-पुण्य करेंआलस्य

Utpanna Ekadashi FAQs

Q1. Utpanna Ekadashi क्यों मनाई जाती है?

उत्पन्ना एकादशी एकादशी देवी के प्राकट्य की स्मृति में मनाई जाती है। यह तिथि अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक मानी जाती है।

यह कथा बताती है कि ईश्वर स्वयं धर्म की रक्षा के लिए शक्ति उत्पन्न करते हैं। इसे सुनने और पढ़ने से भक्ति और श्रद्धा दृढ़ होती है।

यह व्रत गृहस्थ, साधु, वृद्ध और युवा सभी कर सकते हैं। श्रद्धा और नियम का पालन इसकी मुख्य शर्त है।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप इस दिन विशेष रूप से फलदायी माना गया है।

2026 में यह एकादशी मार्गशीर्ष मास में आने के कारण साधना और भक्ति के लिए विशेष फलदायी मानी जाती है।

उत्पन्ना एकादशी कथा – YouTube वीडियो

Realetd Post