Yogini Ekadashi 2026 – तिथि, कथा, महत्व, पूजा विधि और उपवास नियम

Yogini Ekadashi Vrat Katha – Complete Story in Hindi
योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली अत्यंत महत्वपूर्ण, पाप-नाशिनी और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी मानी जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि Yogini Ekadashi का व्रत करने से मनुष्य के 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत न केवल पापों का नाश करता है, बल्कि स्वास्थ्य, सौभाग्य, मानसिक शक्ति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है। योगिनी एकादशी को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है जो जीवन में किसी अभिशाप, दोष, रोग, बाधा या नकारात्मक ऊर्जा से परेशान हों। इस व्रत की शक्ति साधक को पापों के बंधन, मानसिक अशुद्धि और दुर्भाग्य से मुक्त कर जीवन को नई दिशा देती है। यह व्रत विशेषकर भगवान विष्णु की कृपा पाने, शारीरिक रोगों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है।

Yogini Ekadashi 2026 – तिथि, मुहूर्त व पारण समय

विवरणसमय / तिथि
एकादशी तिथि प्रारंभ14 जून 2026, शाम 05:10 बजे
एकादशी तिथि समाप्त15 जून 2026, शाम 04:15 बजे
पारण का समय16 जून 2026, सुबह 06:11 बजे से 08:25 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त16 जून 2026, शाम 07:00 बजे

Yogini Ekadashi Vrat Katha – योगिनी एकादशी की सम्पूर्ण, विस्तृत, पूर्ण कथा

पुराणों में वर्णन है कि प्राचीन काल में अलकापुरी नामक दिव्य नगर था जहाँ धन के अधिपति कुबेर राज करते थे। वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा के साथ शिवजी का पूजन करते थे। उनके विशाल दरबार में हजारों यक्ष और गण उनकी सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उन्हीं में से एक था हेममाली, जो रूप-लावण्य से युक्त, शक्तिशाली और तेजस्वी यक्ष था। उसका मुख्य कार्य था प्रतिदिन मानसरोवर से सुंदर, सुगंधित कमल-पुष्प तोड़कर लाना और शिवपूजन के समय राजा कुबेर को देना। यह कार्य अत्यंत पवित्र माना जाता था, क्योंकि वह सीधे भगवान शिव की आराधना का अंग था।

हेममाली की पत्नी का नाम था विशालाक्षी। वह अत्यंत सुंदर और कामिनी थी। हेममाली अपनी पत्नी पर मोहित रहता था और धीरे-धीरे अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने लगा। एक दिन वह अपनी पत्नी के साथ आलिंगन और प्रेमालाप में इतना डूब गया कि वह अपने सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य पुष्प लाने को भूल गया। पूजा का समय निकल गया, पर हेममाली नहीं लौटा। कुबेर ने समय बीतता देखा तो तत्काल हेममाली को बुलाने का आदेश दिया। जब राजकर्मचारियों ने बताया कि हेममाली अपने घर पर है, कुबेर को अत्यंत क्रोध आया।

कुबेर बोले
यह यक्ष अपने धर्म और कर्तव्य को भूल गया है। यदि भगवान शिव के पूजन में विलंब होता है, तो मैं ऐसा अपराध कभी क्षमा नहीं कर सकता!

जैसे ही हेममाली दरबार में पहुँचा, कुबेर की भृकुटियाँ क्रोध से तनी हुई थीं। उन्होंने हेममाली को कठोर स्वर में कहा
हे दुष्ट! तूने अपने कर्तव्य की अवहेलना की है। तूने पवित्र सेवा को कलंकित किया है। अतः मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू यक्ष रूप से वंचित होकर धरती पर रोगी, दुखी और कष्टों से पीड़ित होकर भटकेगा!

कुबेर के शाप की शक्ति से उसी क्षण हेममाली का दिव्य रूप नष्ट हो गया। उसका शरीर कोढ़ जैसे असहनीय रोग से भर गया, चेहरा विकृत हो गया और उसका तेज समाप्त हो गया। वह पत्नी से दूर हुआ, राज्य से निकाल दिया गया और अकेला, पीड़ित और भूखा-प्यासा जंगलों में भटकने लगा। उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि कोई उसके पास आने तक से डरने लगा।

कई दिनों तक वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर इधर-उधर घूमता रहा। कभी पहाड़ों में, कभी नदियों के किनारे, कभी निर्जन वनों में वह जीवन के लिए संघर्ष करता। उसका शरीर लगातार क्षीण होता जा रहा था। हेममाली के मन में सिर्फ एक ही प्रश्न था “क्या मेरा इस अवस्था से कभी उद्धार होगा?

भटकते-भटकते वह हिमालय के समीप स्थित महान तपस्वी ऋषि मार्कंडेय के आश्रम पहुँचा। ऋषि मार्कंडेय अपने तेज और तप के कारण सभी लोकों में विख्यात थे। उन्होंने हेममाली के अत्यंत दयनीय रूप को देखा और करुणा से भर उठे। पूछने पर हेममाली ने अपनी पूरी कथा रोते हुए सुनाई—कुबेर की सेवा में लापरवाही, शाप, रोग, गरीबी, और भग्न जीवन।

ऋषि ने शांत स्वर में कहा
हे हेममाली, निराश मत हो। हर पाप का प्रायश्चित्त होता है। तुमने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की है, परंतु श्रद्धा और व्रत की शक्ति से तुम अपने पापों से मुक्त हो सकते हो। आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत तुम्हारे सभी पापों को नष्ट कर देगा। यह एकादशी लाखों पापों का नाश करने वाली, रोगों को दूर करने वाली और जीवन में प्रकाश लाने वाली है। यदि तुम पूर्ण श्रद्धा और नियम से यह व्रत करोगे, तो अवश्य ही शाप से मुक्त हो जाओगे।

ऋषि के वचन सुनकर हेममाली के भीतर आशा की किरण जाग उठी। अगले ही आषाढ़ कृष्ण एकादशी को उसने संकल्प लेकर पूर्ण व्रत किया। उसने गंगाजल से स्नान किया, भगवान विष्णु का ध्यान किया और पूरे दिन उपवास रखा। रात को भजन-कीर्तन में लीन होकर जागरण किया

द्वादशी के पारण के क्षण जैसे ही उसने भगवान का स्मरण किया, उसके शरीर से रोग दूर होने लगे। कुछ ही पलों में उसका पूरा शरीर चमकदार और स्वस्थ हो गया। उसका दिव्य यक्ष रूप वापस प्रकट हो गया। हेममाली भाव-विभोर होकर ऋषि के चरणों में गिर पड़ा।

वह तुरंत अलकापुरी लौटा और कुबेर के चरणों में क्षमा माँगी। कुबेर ने उसके रूप और परिवर्तन को देखकर आश्चर्य किया और बोले: निश्चय ही योगिनी एकादशी अद्भुत है। इसने तुम्हें न केवल रोग से मुक्त किया, बल्कि पाप और शाप से भी उबार लिया।

तभी से योगिनी एकादशी को शाप-मोचिनी, रोग-नाशिनी, पाप-हरिणी और अत्यंत कल्याणकारी एकादशी कहा जाता है।

Yogini Ekadashi Puja Vidhi – पूजा विधि

योगिनी एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और तुलसी माता की पूजा से व्रत का आरंभ करें। पूजा में चंदन, पुष्प, धूप, दीप, तुलसीदल, फल और पंचामृत का प्रयोग करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करते हुए भगवान विष्णु को नैवेद्य अर्पित करें। दिनभर उपवास रखें और सात्त्विकता का पालन करें। इस दिन जप, ध्यान, विष्णु सहस्रनाम पाठ और दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। रात्रि में जागरण करने से व्रत का फल और अधिक बढ़ जाता है। अगले दिन द्वादशी में पारण समय देखकर व्रत खोलें।

Yogini Ekadashi Vrat Rules – व्रत के नियम

योगिनी एकादशी में अनाज, चावल, दाल, तामसिक भोजन, मांसाहार और मद्य का त्याग करें। पूरे दिन संयम, शांति और सात्त्विकता बनाए रखें। व्रतधारी को झूठ, क्रोध, निंदा, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। फलाहार, दूध, मेवा, नारियल पानी और सात्त्विक पदार्थ ग्रहण किए जा सकते हैं। दान – विशेषकर भोजन और जलदान—अत्यंत शुभ माना जाता है। द्वादशी पारण समय का पालन करना अनिवार्य है, क्योंकि सही समय पर व्रत खोलने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करेंक्या न करें
विष्णु पूजा और मंत्रजपअनाज, चावल, दाल
दान, विशेषकर भोजन-दानक्रोध, विवाद
फलाहार और सात्त्विक भोजनतामसिक भोजन
रात्रि जागरण और ध्याननकारात्मक विचार
शांत चित्त बनाए रखेंगलत संगति

FAQs - Yogini Ekadashi Vrat

Q1. Yogini Ekadashi 2026 का मुख्य लाभ क्या है?
यह एकादशी पापों को नष्ट करती है, रोगों से मुक्ति देती है, नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और मन को शुद्ध करती है। यह व्रत मानसिक शांति, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है।
हेममाली की कथा सिखाती है कि कर्तव्य की उपेक्षा पाप का कारण बनती है, लेकिन सच्चे मन से किए गए व्रत और भक्ति से सबसे बड़ा पाप भी नष्ट हो सकता है।
फल, दूध, मेवा, नारियल पानी और सात्त्विक आहार लिया जा सकता है। अनाज, चावल, दाल, मांसाहार और तामसिक भोजन पूरी तरह वर्जित हैं।
हाँ, यह व्रत विशेषकर रोगों से मुक्ति, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने, शाप से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
द्वादशी के शुभ पारण समय में स्नान कर पूजा करें और सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें। पारण समय का पालन करना व्रत की सिद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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