हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। जब भी व्रत, उपवास या धार्मिक अनुष्ठान की बात आती है, तो श्रद्धालुओं के मन में सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि एकादशी कब है / Ekadashi kab hai। सही तिथि पर व्रत करने से ही उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित तिथि है और शास्त्रों में इसे पापों के नाश, मन की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन बताया गया है। इस लेख में एकादशी व्रत से जुड़ी हर आवश्यक जानकारी विस्तार से दी जा रही है, ताकि श्रद्धालुओं को कहीं और भटकने की आवश्यकता न पड़े।
| Date (दिनांक) | Day (दिन) | Ekadashi (एकादशी) |
|---|---|---|
| 14 जनवरी 2026 | बुधवार | शटतिला एकादशी |
| 29 जनवरी 2026 | गुरुवार | जया एकादशी |
| 13 फरवरी 2026 | शुक्रवार | विजया एकादशी |
| 27 फरवरी 2026 | शुक्रवार | आमलकी एकादशी |
| 15 मार्च 2026 | रविवार | पापमोचनी एकादशी |
| 28 मार्च 2026 | शनिवार | कामदा एकादशी |
| 13 अप्रैल 2026 | सोमवार | वरूथिनी एकादशी |
| 27 अप्रैल 2026 | सोमवार | मोहिनी एकादशी |
| 13 मई 2026 | बुधवार | अपरा एकादशी |
| 27 मई 2026 | बुधवार | पद्मिनी एकादशी |
| 11 जून 2026 | गुरुवार | परम एकादशी |
| 25 जून 2026 | गुरुवार | निर्जला एकादशी |
| 10 जुलाई 2026 | शुक्रवार | योगिनी एकादशी |
| 25 जुलाई 2026 | शनिवार | देवशयनी एकादशी |
| 9 अगस्त 2026 | रविवार | कामिका एकादशी |
| 23 अगस्त 2026 | रविवार | श्रावण पुत्रदा एकादशी |
| 7 सितंबर 2026 | सोमवार | अजा एकादशी |
| 22 सितंबर 2026 | मंगलवार | परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी |
| 6 अक्टूबर 2026 | मंगलवार | इंदिरा एकादशी |
| 22 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | पापांकुशा एकादशी |
| 4 नवंबर 2026 | बुधवार | रमा एकादशी |
| 20 नवंबर 2026 | शुक्रवार | देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी |
| 4 दिसंबर 2026 | शुक्रवार | उत्पन्ना एकादशी |
| 20 दिसंबर 2026 | रविवार | मोक्षदा (वैकुण्ठ) एकादशी |
एकादशी शब्द संस्कृत के “एकादश” से बना है, जिसका अर्थ है ग्यारह। हिंदू पंचांग के अनुसार चंद्र मास के प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। प्रत्येक महीने में दो बार एकादशी आती है—एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। इस प्रकार सामान्यतः एक वर्ष में 24 एकादशी व्रत होते हैं। अधिक मास पड़ने वाले वर्षों में यह संख्या 26 तक भी हो सकती है।
अधिकांश लोग यही जानना चाहते हैं कि एकादशी कब है, क्योंकि इसकी तिथि सूर्योदय से नहीं बल्कि चंद्र गणना के अनुसार तय होती है। कई बार ऐसा होता है कि एकादशी की तिथि रात में प्रारंभ होकर अगले दिन तक रहती है, जिससे लोगों को भ्रम हो जाता है कि व्रत किस दिन रखा जाए। शास्त्रों के अनुसार जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि हो, उसी दिन एकादशी व्रत किया जाता है। इसी कारण पंचांग देखकर यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है कि एकादशी कब है / Ekadashi kab hai और व्रत की सही तिथि कौन-सी है।
एकादशी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मसंयम और भक्ति का प्रतीक है। इस दिन अन्न का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है और जीवन के कष्टों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
धार्मिक ग्रंथों में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। पद्म पुराण, विष्णु पुराण और स्कंद पुराण में एकादशी व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि एकादशी के दिन अन्न में पाप का वास होता है, इसलिए इस दिन अन्न का सेवन नहीं किया जाता। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक एकादशी व्रत करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
कहा जाता है कि कलियुग में मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल साधन एकादशी व्रत है। यही कारण है कि संत-महात्मा और विष्णु भक्त इस व्रत को विशेष महत्व देते हैं। एकादशी व्रत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का भी माध्यम है। जब कोई भक्त यह जानकर कि एकादशी कब है, पूरी श्रद्धा से व्रत करता है, तो उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
एकादशी व्रत का संबंध केवल व्यक्तिगत मोक्ष से ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के कल्याण से भी जोड़ा गया है। मान्यता है कि एकादशी व्रत करने वाले के पूर्वजों को भी शांति प्राप्त होती है और उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
एकादशी व्रत की विधि सरल होते हुए भी अत्यंत अनुशासन की मांग करती है। इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही मानी जाती है। दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और विशेष रूप से चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
पूजा के समय भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी पत्र और दीप अर्पित किए जाते हैं। तुलसी को भगवान विष्णु अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए बिना तुलसी के पूजा अधूरी मानी जाती है। व्रती अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल, फलाहार या केवल जल ग्रहण करके व्रत कर सकता है। दिनभर भगवान विष्णु का स्मरण, भजन और जप करना व्रत को सफल बनाता है।
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि को किया जाता है। पारण का सही समय जानना उतना ही आवश्यक है जितना यह जानना कि एकादशी कब है / Ekadashi kab hai। पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले किया जाना चाहिए। गलत समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इसलिए पंचांग देखकर पारण का समय अवश्य तय करना चाहिए।
एकादशी व्रत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की दृष्टि से भी लाभकारी माना जाता है। महीने में दो बार उपवास करने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है और शरीर प्राकृतिक रूप से शुद्ध होता है। यह व्रत आत्मसंयम, धैर्य और मानसिक मजबूती को बढ़ाता है।
जो व्यक्ति नियमित रूप से यह जानकर कि एकादशी कब है, सही तिथि पर व्रत करता है, उसके जीवन में अनुशासन आता है। मन शांत रहता है और नकारात्मक विचारों से दूरी बनती है। यही कारण है कि एकादशी व्रत को केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित रखने का मार्ग भी माना गया है।