रक्षाबंधन साल में सिर्फ एक बार आता है, लेकिन इसकी यादें लंबे समय तक साथ रहती हैं। कई घरों में इस दिन सुबह से ही रसोई में मिठाइयों की खुशबू आने लगती है, तो कहीं बहन अपनी पसंद की राखी बार-बार देखकर मुस्कुरा रही होती है। दिलचस्प बात यह है कि हर परिवार का रक्षाबंधन मनाने का तरीका थोड़ा अलग होता है, लेकिन राखी बांधते समय कुछ परंपराएं लगभग हर घर में देखने को मिल जाती हैं।
अगर पहली बार घर में पूजा की जिम्मेदारी आपके ऊपर है या बस यह जानना चाहते हैं कि राखी बांधते समय किन बातों का ध्यान रखा जाता है, तो यह जानकारी आपके काम आएगी।
हमारे बड़े हमेशा कहते हैं कि किसी भी शुभ काम की शुरुआत साफ मन और अच्छी भावना से करनी चाहिए। यही बात रक्षाबंधन पर भी लागू होती है।
सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें। घर के मंदिर में दीपक जलाएं और भगवान का स्मरण करें। इसके बाद आराम से पूजा की थाली तैयार कर लें। कई लोग आखिरी समय पर चीजें ढूंढने लगते हैं, जिससे पूरा माहौल जल्दबाजी वाला हो जाता है। बेहतर है कि सब कुछ पहले ही तैयार हो।
अगर आपने कभी मां या दादी की पूजा की थाली देखी होगी, तो उसमें बहुत ज्यादा सामान नहीं होता। एक राखी, रोली, चावल, दीपक, फूल, मिठाई और थोड़ा-सा जल इतना काफी माना जाता है।
कुछ परिवार नारियल रखते हैं, कुछ कलावा भी रखते हैं। यह पूरी तरह घर की परंपरा पर निर्भर करता है। इसलिए अगर आपके घर में पूजा का तरीका थोड़ा अलग है, तो उसी को अपनाइए। त्योहार का मतलब यह नहीं कि हर चीज बिल्कुल एक जैसी हो।
जब भाई पूजा के लिए बैठ जाए, तो सबसे पहले उसके माथे पर तिलक लगाया जाता है। उसके बाद चावल लगाए जाते हैं और फिर दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधी जाती है।
राखी बांधते समय कोई लंबा मंत्र बोलना जरूरी नहीं है। अगर मंत्र जानते हैं तो अच्छा है, लेकिन नहीं जानते तो भगवान का नाम लेकर भाई की खुशियों की कामना करना भी उतना ही अच्छा माना जाता है।
पूजा पूरी होने के बाद आरती उतारी जाती है और मिठाई खिलाई जाती है। कई घरों में इसके बाद हंसी-मजाक शुरू हो जाता है। सच कहें तो त्योहार का सबसे अच्छा हिस्सा अक्सर वही होता है।
यह सवाल हर साल कई लोगों के मन में आता है। हिंदू परंपरा में दाहिने हाथ को शुभ कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। इसी वजह से अधिकांश परिवारों में राखी भी दाहिनी कलाई पर ही बांधी जाती है।
हालांकि अगर किसी विशेष परिस्थिति में ऐसा संभव न हो, तो परिवार के बड़े जैसा उचित समझें, वैसा किया जा सकता है।
रक्षाबंधन पर शुभ समय देखने की परंपरा काफी पुरानी है। खासकर भद्रा काल में राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है।
लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि भाई किसी दूसरे शहर से कुछ घंटों के लिए ही घर आया हो। ऐसे में परिवार मिलकर जो सही लगे, वही निर्णय लेता है। त्योहार का उद्देश्य परिवार को जोड़ना है, तनाव बढ़ाना नहीं।
अक्सर पूरी चर्चा बहन के इर्द-गिर्द होती है, जबकि इस दिन भाई की भी जिम्मेदारी होती है। राखी बंधवाने के बाद बहन का आशीर्वाद लेना, उसे सम्मान देना और अपनी तरफ से कोई छोटा-सा उपहार देना एक सुंदर परंपरा है। उपहार छोटा हो या बड़ा, उससे ज्यादा मायने यह रखता है कि उसमें अपनापन कितना है।
आज के समय में बहन की रक्षा का मतलब सिर्फ शारीरिक सुरक्षा नहीं है। उसकी बात समझना, मुश्किल समय में साथ देना और उसके फैसलों का सम्मान करना भी उसी वचन का हिस्सा है।
आजकल नौकरी और पढ़ाई की वजह से हर कोई अपने शहर में नहीं रह पाता। ऐसे में कई बार रक्षाबंधन साथ मनाना संभव नहीं होता।
इसका मतलब यह नहीं कि त्योहार अधूरा रह जाएगा। राखी पहले भेजी जा सकती है और वीडियो कॉल पर भी पूजा की जा सकती है। बहुत-से परिवार अब इसी तरह रक्षाबंधन मनाते हैं और उनके लिए भी यह दिन उतना ही खास होता है।
राखी बांधते समय लोग कभी-कभी फोटो और वीडियो बनाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि त्योहार का असली मजा पीछे छूट जाता है।
कोशिश कीजिए कि कुछ मिनट मोबाइल से दूर रहें। साथ बैठकर चाय पीजिए, पुरानी बातें याद कीजिए और खुलकर हंसिए। सालों बाद यही पल सबसे ज्यादा याद आते हैं, न कि किसने कितना महंगा उपहार दिया था।
राखी बांधने के नियम बहुत कठिन नहीं हैं। साफ मन से पूजा करना, तिलक लगाना, दाहिनी कलाई पर राखी बांधना, शुभ समय का ध्यान रखना और एक-दूसरे के लिए दिल से शुभकामनाएं देना यही इस पर्व की सबसे बड़ी परंपरा है।
आखिर में यही कह सकते हैं कि रक्षाबंधन सिर्फ पूजा की एक रस्म नहीं, बल्कि ऐसा दिन है जो भाई-बहन को यह याद दिलाता है कि जिंदगी चाहे कितनी भी व्यस्त क्यों न हो जाए, रिश्तों के लिए समय निकालना हमेशा जरूरी होता है।