किसी संत का जीवन अचानक संत नहीं बनता। उसके पीछे वर्षों की चुपचाप चलती हुई एक आंतरिक यात्रा होती है सवालों की, खोज की, और कभी-कभी अकेलेपन की भी। श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, जिनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय था, की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
आज लोग उन्हें वृंदावन के एक पूजनीय संत के रूप में जानते हैं, लेकिन उनकी संत-जीवन की नींव बहुत कम उम्र में पड़ चुकी थी।
उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे अनिरुद्ध कुमार पांडेय का बचपन सामान्य परिवेश में बीता। घर में धार्मिक संस्कार थे, पूजा-पाठ का वातावरण था, लेकिन फिर भी उनका झुकाव कुछ अलग ही था।
जहाँ परिवार के बाकी बच्चे पढ़ाई और खेल में व्यस्त रहते, वहीं अनिरुद्ध का मन अक्सर किसी शांत कोने में बैठकर भजन गुनगुनाने या ईश्वर का नाम जपने में लगता।
यह केवल बाल्यकाल की मासूम रुचि नहीं थी। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि उनका मन सांसारिक आकर्षणों में नहीं रमता। उन्हें खिलौनों से ज्यादा मंदिर की घंटियाँ आकर्षित करती थीं। कभी-कभी वे गहरी सोच में डूब जाते, जैसे भीतर कोई प्रश्न चल रहा हो जीवन का असली उद्देश्य क्या है?
कई लोग बताते हैं कि बहुत छोटी उम्र से ही उनमें एक प्रकार की वैराग्य भावना दिखाई देती थी। उन्हें नए कपड़ों या चीज़ों का विशेष उत्साह नहीं होता। साधारण जीवन उन्हें सहज लगता।
उनका मन बार-बार आध्यात्मिक पुस्तकों, संतों की कथाओं और भजन-सत्संग की ओर खिंचता। आसपास के लोग इसे उनकी धार्मिक प्रवृत्ति कहकर देखते, पर भीतर कुछ और गहराई से आकार ले रहा था।
यह वह उम्र होती है जब बच्चे सपने देखते हैं बड़े होकर क्या बनेंगे, क्या करेंगे। लेकिन अनिरुद्ध के मन में एक अलग ही सपना था ईश्वर को जानने का।
घर छोड़ना अंत नहीं, शुरुआत थी। यहीं से उनकी आध्यात्मिक यात्रा आरंभ हुई साधु-संतों के सान्निध्य की तलाश, भजन, जप, ध्यान और सादगी भरा जीवन।
यह समय आसान नहीं रहा होगा। सीमित संसाधन, अनिश्चित भविष्य, और एक किशोर उम्र। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों ने उनके भीतर धैर्य और सहनशीलता को मजबूत किया।
सादगी ने उन्हें सिखाया कि जीवन की जरूरतें बहुत कम हैं।
त्याग ने उन्हें सिखाया कि आसक्ति ही बंधन है।
और भक्ति ने उन्हें सिखाया कि ईश्वर दूर नहीं, भीतर है।
प्रारंभिक वर्षों की यही सादगी उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई। उन्होंने समझा कि आध्यात्मिकता केवल बाहरी वस्त्रों या दिखावे में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिति में है। अगर मन शांत है, तो परिस्थिति कैसी भी हो, व्यक्ति स्थिर रह सकता है।
किशोरावस्था में ही जो त्याग उन्होंने अपनाया, उसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। आज जब लोग उनके जीवन को देखते हैं, तो उन्हें एक संत दिखाई देते हैं। लेकिन उस संत के पीछे एक 13 वर्ष का बालक भी है जिसने अपने भीतर की पुकार को गंभीरता से सुना और उस पर चल पड़ा।
हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी एक क्षण आता है, जब उसे अपने भीतर की आवाज़ सुनाई देती है। अधिकांश लोग उसे अनसुना कर देते हैं। अनिरुद्ध कुमार पांडेय ने उसे अनसुना नहीं किया।
उन्होंने उस पुकार को स्वीकार किया, चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। यही स्वीकार उनके संत जीवन की नींव बना।
प्रेमानंद जी महाराज के प्रारंभिक जीवन की कहानी हमें यह समझाती है कि संत अचानक नहीं बनते। वे भी किसी घर में जन्म लेते हैं, बचपन जीते हैं, सवाल पूछते हैं। फर्क बस इतना होता है कि वे अपने सवालों को दबाते नहीं, उनके उत्तर खोजने निकल पड़ते हैं।
13 साल का वह निर्णय केवल घर छोड़ने का नहीं था
वह आत्मा की यात्रा शुरू करने का निर्णय था। और शायद यही उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश है जब भीतर की पुकार सच्ची हो, तो उम्र मायने नहीं रखती।