किसी भी संत का जीवन अकेली यात्रा नहीं होता। उसके पीछे एक परंपरा होती है, एक गुरु होता है, और एक ऐसी वंशधारा होती है जो पीढ़ियों से आध्यात्मिक दीप जलाती चली आ रही है। प्रेमानंद जी महाराज के जीवन को समझना हो, तो उनकी गुरु-परंपरा और राधावल्लभ सम्प्रदाय से उनके संबंध को समझना बहुत आवश्यक है।
उनकी साधना केवल व्यक्तिगत अनुभव का परिणाम नहीं है, बल्कि एक जीवंत परंपरा की धारा में प्रवाहित भक्ति का विस्तार है।
प्रेमानंद जी महाराज का संबंध Radhavallabh Sampradaya से है। यह सम्प्रदाय राधा-कृष्ण की माधुर्य भक्ति पर आधारित है, जहाँ राधा जी को सर्वोच्च प्रेम-तत्व के रूप में माना जाता है। इस परंपरा की स्थापना Shri Hit Harivansh Mahaprabhu ने की थी। यहाँ भक्ति का केंद्र केवल विधि-विधान नहीं, बल्कि प्रेम है ऐसा प्रेम जिसमें अधिकार नहीं, समर्पण हो; अपेक्षा नहीं, केवल अर्पण हो।
राधावल्लभ परंपरा का दर्शन सरल है, लेकिन अत्यंत गहरा। इसमें ईश्वर को पाने का मार्ग ज्ञान या तर्क से अधिक प्रेम और भाव से होकर गुजरता है। प्रेमानंद जी महाराज ने इसी परंपरा में दीक्षा ली और उसी के अनुसार अपनी साधना को आकार दिया।
किसी भी साधक के जीवन में दीक्षा का क्षण बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह केवल मंत्र प्राप्त करने का क्षण नहीं, बल्कि दिशा मिलने का क्षण होता है। प्रेमानंद जी महाराज को आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिला Shri Hit Gaurangi Sharan Ji Maharaj से।
उनका जीवन मोड़ उसी समय स्पष्ट हुआ, जब उन्होंने गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित किया। गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता। गुरु वह होता है जो साधक के भीतर छिपी चेतना को जगाता है। गुरु का सान्निध्य केवल शिक्षा नहीं, अनुभव देता है।
श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज ने उन्हें केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि भक्ति को जीना सिखाया।
हम अक्सर गुरु को शिक्षक समझ लेते हैं, लेकिन आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान कहीं अधिक ऊँचा होता है। गुरु साधक को केवल रास्ता नहीं दिखाता, बल्कि उसे उस रास्ते पर चलने की शक्ति भी देता है।
प्रेमानंद जी महाराज के जीवन में यह स्पष्ट दिखाई देता है। उनके प्रवचनों में बार-बार गुरु-भक्ति का महत्व आता है। वे कहते हैं कि बिना गुरु के मार्ग कठिन हो जाता है, क्योंकि मन स्वयं को ही मार्गदर्शक बना लेता है और भ्रम में पड़ सकता है। गुरु साधक को स्वयं से बचाता है उसके अहंकार से, उसकी शंकाओं से, और उसके भ्रम से।
गुरु-भक्ति का अर्थ अंधानुकरण नहीं है। इसका अर्थ है विश्वास। जब साधक अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास करता है, तब उसके भीतर का भय कम हो जाता है। उसे पता होता है कि वह अकेला नहीं है।
समर्पण का अर्थ हार मानना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को शांत करना है। प्रेमानंद जी महाराज का जीवन इसी समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने अपने गुरु की आज्ञा को जीवन का आधार बनाया। उनकी वाणी में जो स्थिरता और भाव की गहराई दिखाई देती है, वह गुरु-कृपा का ही परिणाम मानी जाती है।
भक्ति में एक शब्द बार-बार आता है कृपा। साधक प्रयास करता है, साधना करता है, लेकिन अंतिम अनुभव केवल कृपा से ही संभव माना जाता है। राधावल्लभ परंपरा में यह विश्वास है कि जब साधक सच्चे मन से समर्पण करता है, तब गुरु और भगवान की कृपा स्वतः बरसती है।
प्रेमानंद जी महाराज अपने प्रवचनों में यही बात समझाते हैं प्रयास करो, नाम जपो, सेवा करो, लेकिन परिणाम को कृपा पर छोड़ दो।
प्रेमानंद जी महाराज की आध्यात्मिक यात्रा को उनकी गुरु-परंपरा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राधावल्लभ सम्प्रदाय की प्रेम-प्रधान भक्ति, गुरु का सान्निध्य, और पूर्ण समर्पण यही उनकी साधना की नींव है।
उनका जीवन यह सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग अकेले चलने की यात्रा नहीं है। यह परंपरा से जुड़ने, गुरु के चरणों में बैठने, और प्रेम को जीवन का आधार बनाने की प्रक्रिया है। और शायद यही संदेश उनकी वाणी में बार-बार सुनाई देता है ज्ञान से अधिक प्रेम, प्रयास से अधिक कृपा, और अहंकार से अधिक समर्पण।