रक्षाबंधन का दिन आते ही बचपन की कितनी ही बातें याद आने लगती हैं। कभी बहन राखी छिपाकर रखती थी ताकि भाई पहले से न देख ले, तो कभी भाई जेब खर्च बचाकर कोई छोटा-सा उपहार खरीद लाता था। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कलाई पर बंधने वाला यह साधारण-सा धागा आखिर शुरू कहां से हुआ।
सच कहें तो यह सवाल जितना आसान लगता है, उसका जवाब उतना सीधा नहीं है। रक्षाबंधन का इतिहास किसी एक कहानी या एक घटना से नहीं जुड़ा है। अलग-अलग ग्रंथों, लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं में इसकी अलग-अलग झलक मिलती है। शायद यही वजह है कि आज भी जब राखी की बात होती है, तो उसके साथ कई कहानियां भी याद की जाती हैं।
बहुत पहले रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा थी, लेकिन उसका रिश्ता सिर्फ भाई-बहन से नहीं था। यज्ञ या किसी शुभ कार्य के समय ऋषि और पुरोहित लोगों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते थे। उसका अर्थ था ईश्वर तुम्हारी रक्षा करें और जीवन में शुभता बनी रहे।
धीरे-धीरे समय बदला। समाज बदला। परंपराएं भी बदलीं। फिर यही रक्षा सूत्र भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ गया और आगे चलकर रक्षाबंधन के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
अगर आपने बचपन में रक्षाबंधन की कहानी सुनी होगी, तो उसमें भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का नाम जरूर आया होगा। लोकमान्यता के अनुसार, एक बार श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी। खून बहता देखकर द्रौपदी ने बिना कुछ सोचे अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।
यह कोई बड़ी रस्म नहीं थी। न पूजा हुई, न कोई मंत्र पढ़ा गया। बस अपनापन था। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने उसी पल द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया। बाद में महाभारत में जब द्रौपदी पर संकट आया, तब भगवान कृष्ण ने उस वचन को निभाया। शायद यही वजह है कि लोग इस कहानी को राखी की भावना से जोड़कर देखते हैं।
रक्षाबंधन का जिक्र देवराज इंद्र की कथा में भी मिलता है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों के बीच युद्ध चल रहा था। इंद्र लगातार चिंता में थे। तब उनकी पत्नी इंद्राणी ने पूजा की और उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बांधा।
यह धागा सिर्फ धागा नहीं था, बल्कि विश्वास का प्रतीक था। माना जाता है कि इसके बाद इंद्र को युद्ध में सफलता मिली। यही कारण है कि रक्षा सूत्र को शुभ और मंगलकारी माना जाता है।
एक और लोकप्रिय कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई बना लिया। बदले में राजा बलि ने उनसे वर मांगने को कहा। तब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वापस ले जाने की इच्छा जताई।
इस कहानी से यह बात समझ आती है कि राखी सिर्फ खून के रिश्तों तक सीमित नहीं रही। कई बार यह विश्वास और अपनापन जोड़ने का माध्यम भी बनी।
अगर सौ-दो सौ साल पहले का रक्षाबंधन और आज का रक्षाबंधन देखें, तो काफी फर्क दिखाई देता है। पहले साधारण सूती धागे की राखी होती थी। अब बाजार में बच्चों, युवाओं और बड़ों के लिए अलग-अलग तरह की राखियां मिलती हैं।
पहले उपहार का मतलब मिठाई या कुछ रुपये होता था। आज लोग अपनी पसंद के अनुसार घड़ी, कपड़े, किताबें या दूसरी चीजें भी देते हैं। लेकिन एक चीज आज भी नहीं बदली रिश्तों में अपनापन।
आज भाई-बहन अक्सर अलग-अलग शहरों में रहते हैं। किसी की नौकरी दूसरे राज्य में है, तो कोई पढ़ाई के लिए घर से दूर है। फिर भी रक्षाबंधन आते ही कोशिश यही रहती है कि किसी तरह बात हो जाए। अगर घर नहीं पहुंच पाए, तो वीडियो कॉल पर ही सही, लेकिन त्योहार मनाया जरूर जाता है।
यही तो इस पर्व की खूबसूरती है। दूरी बढ़ सकती है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कम नहीं होती।
अगर ध्यान से देखें, तो राखी की कीमत उसके धागे में नहीं होती। उसकी कीमत उस भावना में होती है, जिसके साथ बहन उसे बांधती है। उसमें बचपन की शरारतें भी होती हैं, लड़ाइयां भी, माफियां भी और ढेर सारी दुआएं भी।
शायद इसी वजह से साल भर में आने वाले इतने सारे त्योहारों के बीच रक्षाबंधन लोगों के दिल के सबसे करीब रहता है।
रक्षाबंधन का इतिहास किसी एक किताब या एक कहानी में नहीं समाया है। यह कई परंपराओं, लोककथाओं और बदलते समय के साथ आगे बढ़ा हुआ एक खूबसूरत सफर है।
आज राखी भाई-बहन के प्यार का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है। लेकिन अगर इसकी सबसे बड़ी सीख एक वाक्य में कहनी हो, तो शायद वह यही होगी रिश्ते धागों से नहीं, निभाने से मजबूत होते हैं। और रक्षाबंधन हर साल हमें यही बात फिर से याद दिला जाता है।